आज दुश्वार मैं लगा मुझको।

यूँ गुनहगार मैं लगा मुझको।।


दुश्मने-जान किसको ठहराऊं

क्या कभी यार मैं लगा मुझको।।


उसके एजाज में ग़ज़लगोई

करके कुफ़्फ़ार मैं लगा मुझको।।


सरनिगूँ था मैं आपके दर पर

कब परस्तार  मैं लगा मुझको।।


ग़ैर अपने भले लगे न लगे

और अग्यार मैं लगा मुझको।।


ऐ अनारो तुझे भले न लगे

तेरा बीमार मैं लगा मुझको।।


साहनी की ग़ज़ल अरे तौबा

सच मे बेकार मैं लगा मुझको।।


सुरेश साहनी, कानपुर

9451545132

Comments