यूँ तो ख़्वाबो-ख़याल में थी कल।

फिर न जाने कहाँ गयी वो ग़ज़ल।।

मरमरी मरमरी थे शेर उसके

वो ग़ज़ल थी कि कोई ताजमहल।।साहनी

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