अब न रोयेंगे सिसकियाँ लेकर।
ख़ूब जीयेंगे मस्तियाँ लेकर।।
क्या किसी का निशान रहना है
क्यों जियों हम निशानियाँ लेकर।।
खाक़ दिल के करीब पहुँचेंगे
हम दिमागों में दूरियाँ लेकर।।
ग़म के दरियाब पार करने हैं
वो भी कागज़ की कश्तियाँ लेकर।।
इस ख़राबा में शोर कैसा हैं
हम चले थे खमोशियाँ लेकर।।
अब नशेमन नहीं तो डर कैसा
लाख आयें वो बिजलियाँ लेकर।।
ये दिये साहनी ने बाले हैं
शौक़ से आओ आँधियाँ लेकर।।
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132
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