ग़ज़ल

हम से कहता है इबादत में रहो।
साफ कह देता कि खलवत में रहो।।
तय हुआ हम अपना इमां बेच दें
तुमको रहना है तो गुरबत में रहो।।
आदमी  से जानवर हो जाओगे
और कुछ दिन उसकी सोहबत में रहो।।
तुमको भी ऎयारियां आ जाएंगी
चन्द दिन तुम भी सियासत में रहो।।
यूँ न रो उसकी जफ़ाओं के लिए
किसने बोला था कि उल्फ़त में रहो।।
साफगोई भी बवाले-जान है
सब ये कहते हैं शराफत से रहो।।

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