हो गए जख्म फिर हरे शायद!



हो गए जख्म फिर हरे शायद!
आप हैं दर्द से भरे शायद!!
जिक्र है हश्रे बेवफाई का
आप भी हैं डरे डरे शायद!!
आज आया है मेरी तुर्बत पर
आज शिकवा-गिला करे शायद!!
आज है ईद भी दशहरा भी
आज रावण कोई मरे शायद!!
उसके वादे तो इन्तिख़ाबी है
हम गरीबों के दिन फिरे शायद!!
फिर उसे मेरी याद आई है
काम आये हैं मशवरे शायद!!

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