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Showing posts from 2026
 वो हसीं रात फिर कभी न हुयी। आपसे बात फिर कभी न हुयी।। साथ बारिश में भीगना तय था यूँ के बरसात फिर कभी न हुयी।।
 चुप रहो इक मुकम्मल ग़ज़ल बन सके प्यार का ख़ूबसूरत महल बन सके ताज तैयार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।साहनी
 क्या तआरुफ़ है मेरा भूल गए। बाखुदा हम तो ख़ुदा भूल गए।। एक बस तेरी गली याद रही और हम अपना पता भूल गए।। तुझको मालूम नहीं है ये अदा क्या नहीं तेरे सिवा भूल गए।। इसमें हैरत की कोई बात नहीं तुम अगर तर्ज़े-वफ़ा भूल गए।।
 क्या ज़रूरी है ओहदे पर हो। तुम किसी हाल में मोहतबर हो।। प्यार रिश्तों में हो ज़रूरी है फिर महल हो कि फूस का घर हो  ।। चाँद तारों की क्या ज़रूरत है जीस्त जब प्यार से मुनव्वर हो।। हम हैं उल्फत के आस्ताने से कोई बेशक़ बड़ा सिकन्दर हो।। साहनी कौन जानता है तुम्हें अब न कहना कि तुम सुख़नवर हो।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 प्रेम सौंदर्य की अर्चना कर सके नैन नत हो प्रणय याचना कर सके  रूप रतनार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।
 यदि जनता के साथ चलें तो सरकारों का गिरना तय है आज मशीनों का बहुमत है जनता का मत क्या मतलब है सब कुछ पूँजी से होना है सब हों सहमत क्या मतलब है सत्ता की ताकत को समझो हर विरोध का मरना तय है तुम  करते थे चोरी थी जो हम करते है  अब विकास है आओ साथ नहा लो गंगा उन्नति का ग्लोबल प्रयास है हरिश्चन्द्र अब क्या कर लेंगे रोहिताश्व का मरना तय है..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमें हम छोड़कर बढ़ने लगे हैं। कई इस बात से कुढ़ने लगे हैं।। बहुत पछताए उन पर कहके गज़लें हमी सुनने हमीं पढ़ने  लगे हैं।। लगे है जा चुका है दौर अपना हमें सब फ्रेम में जड़ने लगे हैं।।  ये डर है बदगुमां करदे न शोहरत हवा में कुछ तो हम उड़ने लगे हैं।। कभी था साहनी भी एक शायर मगर अब सब उसे पढ़ने लगे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 कब न थे कब थे हमारी ज़िन्दगी के मायने। आप कब समझे हमारी किस खुशी के मायने।। मेरे जीते जी न समझा जो हमारे दर्द को क्या समझता फिर हमारी खुदकुशी के मायने।। हुस्न वालों को पता है हुस्न की रांनाईयाँ इश्क़ वाले जानते हैं आशिक़ी के मायने।। जिस ख़ुदा की राह में मरता रहा है आदमी क्या पता है उस ख़ुदा को बन्दगी के मायने।। हम से बेपर्दा हुआ जो क़ुर्बतों के नाम पर वो हमें समझा रहा है पर्दगी के मायने।। जो चरागों को बुझाने में हवा के साथ थे क्या  बतायेंगे हमें वो रोशनी के मायने।। कितनी दरियाओं का पानी पी रहा है रात दिन इक समन्दर को पता है तिश्नगी के मायने।। सुरेश साहनी, कानपुर
 और जाते भी तो कहाँ आख़िर। छोड़ कर क़ू-ए-जाने-जां आख़िर।। हम गदायी हुये तो हैरत क्यों कैसे बेहतर है लामकां आख़िर।।
 किस वफ़ा की तलाश है तुमको क्या ख़ुदा  की तलाश है तुमको।। इश्क़ तुमको हुआ यकीन नहीं जब अना की तलाश है तुमको।। जिसको सुन कर वो लौट सकता था उस सदा की तलाश है तुमको।। कुछ तो सपनों से ख़ुद को दूर करो क्या हवा की तलाश है तुमको।। सुरेश साहनी कानपुर
 ये सोचकर कि सवेरे का क्या भरोसा है घनेरी रात को पूरी तरह जिया मैंने।।साहनी
 यूँ कम नहीं कमाया तुमने घर परिवार बनाया तुमने उठना भारी जहाँ स्वयं का सब का बोझ उठाया तुमने
 आज अपने ख़िलाफ़ है सब कुछ मूड क्या आज ऑफ है सब कुछ मेरा उसका बंटा हुआ क्या है प्यार में हाफ हाफ है सब कुछ कुछ भी पढ़िए कोई न बोलेगा गोष्ठी में मुआफ़ है सब कुछ नींद जाने किधर है क्या बोलें यूँ तो बिस्तर लिहाफ है सब कुछ मेरा दिल मेरी जेब आईना और मौसम भी साफ है सब कुछ सुरेशसाहनी, कानपुर
 क्यों इतने बदहवास से बैठे हुए हो तुम। मुद्दत हुई उदास  से बैठे हुए हो तुम।। कपड़े नहीं ख़याल से जो बरहना लगे कुछ ऐसे बेलिबास से बैठे हुए हो तुम।।
 जब भी उसका ख़याल आया है। चश्मेंनम में उबाल आया है।। किसको दरकार है जवाब मिले आख़िरश क्यों सवाल आया है।।
 जीवन गोया यातना की बहुतेरी किस्म। रूह सदा ढोती रही मन पर बोझिल जिस्म।। दैहिक भौतिक मानसिक या फिर दैविक ताप । इन सब से  भारी रहे   सामाजिक सन्ताप ।। चाहत से चिन्ता बढ़ी बड़ी व्यर्थ परवाह। हुआ भिखारी के सदृश  मन का दौलतशाह।।
 ज़िन्दगी की यही कहानी है। रूह धोखा है जिस्म फानी है।। सिर्फ़ दो दिन हैं हुस्न के नखरें इश्क़ में फिर भी जावेदानी है।।साहनी
 शब्द शब्द से हुए पराये अक्षर अक्षर से ही रूठे। मैं भी गीत कहाँ से लिखता भाव कहाँ से लाता झूठे।। जब तुम थे ऐसा लगता था जैसे मुझको सब हासिल है कविता कहना कठिन नहीं है  गीत सजाना कब मुश्किल है ये सब मेरे खेल खिलौने छूट गए तब जब तुम छूटे।। अक्षर ब्रम्ह जगत मिथ्या पर शब्द सशक्त कहे जाते है किन्तु वियोगी-पद लेते ही भाव विरक्त हुए जाते हैं होती सफल साधना कैसे ,सारे पुण्य समय ने लूटे।। खण्ड खण्ड हो गयी सृजनता महाकाव्य रह गए अधूरे जीवन की चलती चाकी में शेष बचे गीतों के चूरे टेक तुम्हारी पकड़ बच गए तुलसी से दो एक अनूठे।। सुरेशसाहनी
 मैं हैरां हूँ कि मैं इस दौर में हूँ। गनीमत है कि अब भी दौड़ में हूँ।। यहाँ अब जिंदगी जद्दोजहद है मैं अपने आप से ही होड़ में हूँ।। ग़नीमत है कि मेरा वोट भी है नहीं तो मैं कहाँ किस जोड़ में हूँ।। मुझे इंसान कब समझा किसी ने सभी के वास्ते मैं और में हूँ।। मैं इंसां हूँ इसी से मर रहा हूँ मैं दिल्ली में हूँ या लाहौर में हूँ।। सुरेशसाहनी
 माँ की दो रोटी में जैसे जग का प्यार छुपा  रहता था भूख नहीं होती थी तब भी  स्वतः भूख जागा करती थी अब भी दो रोटी आती है  किंतु औपचारिकताओं से पूरित स्नेह स्वार्थ मिश्रण अभिगुँथित  बड़े सलीके से उच्चारित कह दो तो दो और बना दूँ कैसे कह दूँ सोच रहा हूँ भूख मिट गई पेट भर गया फिर भी ऐसा क्यों लगता है मन जैसे संतृप्त नहीं है पढ़े लिखे हैं शिक्षित घर हैं सुविधाओं की कमी नहीं है अब चूल्हों में धुंआ नहीं है सोच रहा हूँ फिर से घर मे मिट्टी का चूल्हा ले आऊँ माँ तेरे खुरदुरे हाथ भी  कितने नरम नरम लगते थे शायद उनमे नेल नहीं थे नोक नुकीले पॉलिश वाले मां अनपढ़ थी पर अच्छी थी..... सुरेशसाहनी, कानपुर
 न सँवर सके न सुधर सके गए तुम तो हम भी गुज़र गए तेरे साथ जितना चले चले तेरे बाद जैसे ठहर गए।। तेरी तरह हम न बदल सके रहे जैसे वैसे  ही रह गये  तेरे साथ चलना था दो कदम तेरे बाद थम के ही रह गये कभी मंज़िलों ने भुला दिया कभी छोड़ राहगुज़र गए।। न सँवर...... तुम्हें देखना है तो देख लो यहीं पास अपनी मज़ार है दो घड़ी सुकून से बैठ लो वो ख़मोशियों का दयार है फ़क़त इसलिए कि पता रहे जो अदीब थे वो किधर गए।।न सँवर...... यहाँ आके आँखें न नम करो तुम्हें किसने बोला कि ग़म करो जिसे प्यार था वो चला गया तो क्यों पत्थरों को सनम करो जो असीर थे वो नहीं रहे तेरे हुस्न के भी असर गए।।न सँवर......
 मैं गंगा हूँ-2 तन से शीतल ,मन से निर्मल धोती हूँ जन जन के कलिमल शिव ने धारा है मस्तक पर आवाहन करता है सागर मत समझो मैं सिर्फ नदी हूँ पाप नाशिनी विष्णुपदी हूँ... गोमुख से गंगा सागर तक बहती आयी हूँ निष्कंटक भारत की  जीवन धारा हूँ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा हूँ तर्पण और वजू का जल हूँ आबे-जमजम गंगाजल हूँ..... मेरा मन तबसे टूटा है अपनों ने मुझको लूटा है मेरा जल चोरी होता है प्यासों को बेचा जाता है और मेरी अपनी संताने बाँध रहीं जाने अनजाने..... खुश थी मैं आयी आज़ादी पर मुझको बेड़ी पहना दी मैं उन्मुक्त सरल आनन्दी अपने ही घर मे हूँ बंदी बेटे माँ को छोड़ रहे हैं मेरी धारा मोड़ रहे हैं..... अब ये सांसे छूट रही है मेरी हम्मत टूट रही है गन्दा जहर प्रदूषित पानी कचड़ा मलवा नाला नाली यह विनती है सुन लो बेटों मुझमें मिलने गिरने मत दो सीधी ज़हर ख़ुरानी रोको इन नालों का पानी रोको जगह जगह मुझको मत बांधो मेरे सब अवरोध हटा दो
 उनसे मिलने के बहाने ढूंढें। फिर मुहब्बत के ज़माने ढूंढें।। फिर कहानी में रवानी आये दास्ताँ खोजें फ़साने ढूंढें।। हम तो उनमें ही उन्हें ढूढेंगे किसलिए ग़ैर के साने ढूंढें।। कौड़ियाँ सीपियाँ कंचे पत्थर थे जो बचपन के खजाने ढूंढें।।
 ज़िन्दगी अपने कैदखाने से। दूर ले चल किसी बहाने से।। सब हैं अपने ही आस्ताने से। क्या शिकायत करें ज़माने से।। सब समझते हैं होश है मुझको बाज़ आया मैं लड़खड़ाने से।। तेरे दर पे भी सरनिगू है हम क्या मिला तेरे पास आने से।। लोग सुनकर हँसी उड़ाते हैं दर्द घटते नहीं बताने से।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 अगर दिलजू नहीं आये चलेगा तो दिल काबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत सीख लो इतना बहुत है कोई जादू नहीं आये चलेगा ये है काग़ज़ के फूलों का ज़माना कोई खुशबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत हम की हस्ती में निहाँ है यहाँ मैं तू नहीं आये चलेगा ज़ुबाँ दिल की ज़रूरी है सुखन को भले उर्दू नहीं आये चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हम सोचे काहे ये सुन्दर सिरजन काट रहे हैं वे बोले हम केक नाम का व्यंजन काट रहे हैं।। दीप जलाने वाले वारिस बुझा रहें कंदीलें पहले जीवन जीते थे अब जीवन काट रहे हैं।। साहनी
 गो समझाते दिल की बातें। किसे बताते दिल की बातें।। उम्र लगी है इन होठों पर आते आते दिल की बातें।। काश कभी हम उस नादां को समझा पाते दिल की बातें।। क्या फागुन समझा पायेगा जाते जाते दिल की बातें।। है सुरेश पागल कह देगा गाते गाते दिल की बातें।। सुरेश साहनी कानपुर
 क्या कभी मैं भी इतना अच्छा था। या तुम्हारी नज़र का धोखा था।। इसमें रुसवाईयाँ हैं ग़म भी है सच बताना कभी ये सोचा था।।साहनी
 क्यों भटकता तेरी राहों में रहूं। गिर के क्यों ख़ुद की निगाहों में रहूं।।  क्यों फिरूँ गलियों में तेरी बावला क्यों न अपनी ही पनाहों में रहूं।।साहनी
 वो हमारे सनम नहीं थे जब क्या नहीं था कि हम नहीं थे जब उस ख़ुदा का कहाँ ठिकाना था इतने दैरोहरम नहीं थे जब।। तब वो जन्नत ज़मीन पर थी क्या पंथ मज़हब धरम नहीं थे जब।। पीने वाले कहाँ थे दुनिया में तब सुराही के खम नहीं थे जब।। इश्क़ होगा ये मान लें कैसे तेरी दुनिया में ग़म नहीं थे जब।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 यूँ भी आतिश पनाह होना है। एक दिन सब तबाह होना है।। हुस्न काजल की कोठरी ठहरा साफ दामन सियाह होना है।। क्या करेगा निगाह शाइस्ता क्या तुझे बदनिगाह होना है।। अब नवाजा है मेरे मुर्शिद ने घर मिरा ख़ानक़ाह होना है।। जिस के सिर पर हो हाथ संजर का एकदिन उसको शाह होना है।। आशिक़ी और फिर ग़ज़लगोई साहनी को तबाह होना है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ। अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।। ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।। किसी को जीत कर भी क्या करूँगा मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।। बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।। निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।। न आएगी सुबह मधुयामिनी की अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।
 नये कपड़े पहन कर बदगुमानी कम अज़ कम उठ के मिलना चाहिए था।।   चला है चार कंधों पर अकड़ कर जिसे ख़ुद झुक के चलना चाहिये था।।
 क्या वो इस तरह परेशान करेगा मुझको। प्यार करने को कहेगा न करेगा मुझको।। देख लेगा भी तो कतरा के निकल जायेगा अजनबी बन के वो हैरान करेगा मुझको।।साहनी
 गान्धी तुम्हे ज़रूरत क्या थी ऐसी धरती पर आने की सत्य अहिंसा दया क्षमा सब हों अक्षम्य अपराध जहाँ पर पर तुम भी अहमक़ थे शायद उन अंग्रेजों से लड़ बैठे जो तुमको आदर देते थे और लड़े भी किनकी ख़ातिर उनकी ख़ातिर समझ गए ना?
 जिसको सुनने की साध रही जिसकी लालसा अगाध रही वह बात नहीं तुम कह पाये  वह बात कहाँ हम सुन पाये।। ऐ काश कभी हम चल पाते उस पथ पर जिस पर चल न सके मिलने की चाह लिए बिछुड़े ऐसे बिछुड़े फिर मिल न सके तुमने थामी विपरीत डगर हम भी भटके दूजे पथ पर किंचित इसकी थी यही नियति कब कुसुम टूट कर खिल पाये दो कदम चले हम  साथ साथ पर जग को साथ नहीं भाया जाने क्यों अपनों को अपना हाथों में हाथ नहीं भाया सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज के दिन थप्पड़ मत मारो बाबूजी। मजदूरों का हक़  मत मारो बाबूजी ।। आप ने बोला था झण्डा फहराना है साथ में अपने कुछ लोगों को लाना है आपकी जय का नारा भी लगवाना है जैसा कहा किया स्वीकारो बाबू जी।। आज के..... आपने बोला था तुमको खर्चा देंगे चाय समोसा दो दो सौ रुपया देंगे आने जाने का सबको भाड़ा देंगे मरे हुओं का हक मत मारो बाबू जी।।आज के...... सुबह के भूखे हैं हम दम से बेदम हैं आपने चांपा मेवा मिसरी चमचम है अपने भी नन्हे बच्चे हैं मैडम हैं घर जाने लायक दे डारो बाबूजी।। आज के... सुरेशसाहनी
 वेदने अब मौन रहना सीख लो हैं कुटिल खूंखार अब संवेदनायें क्या करोगे कौन सुनता हैं व्यथायें सब हँसेंगे जोड़कर अथ वा तथायें लाख तुम निर्दोष या निश्छल रहोगे लोग गढ़ लेंगे कई कुत्सित कथायें चुप न हो बस कुछ न कहना सीख लो अब नहीं सुनती बधिर आत्मीयतायें....... दर्द बांटेगा कोई यह भूल जाओ हर व्यथा हर पीर को उर में छिपाओ बाँटने से पीर बँटती भी नहीं है व्यर्थ अपने आँसुओं को मत लुटाओ प्रेम में चुपचाप दहना सीख लो फिर नहीं मिलनी हैं ये वन वीथिकाएँ ...... .देख क्या अल्हड़ नदी की आज गति है पञ्च कुल्या बन के बंटना ही प्रगति है उम्र ढलती जा रही है आत्ममुग्धे कर वरण अब सिंधु खारा ही नियति है सोच मत वे छिछले सर जो छली थे कर्म परिणति थी वे सड़ कर सूख जायें.......
 यूँ तो ख़्वाबो-ख़याल में थी कल। फिर न जाने कहाँ गयी वो ग़ज़ल।। मरमरी मरमरी थे शेर उसके वो ग़ज़ल थी कि कोई ताजमहल।।साहनी
 तुम क्या क्या अन्जाम बताते फिरते हो रावण को भी राम बताते फिरते हो उल्फत के परिणाम बताते फिरते हो तुम किनको नाकाम बताते फिरते हो भोले हो तुम सचमुच दिल के मसलों में हर छलिया को श्याम बताते फिरते हो दुनिया उनके अफसाने दोहराती है तुम जिनको बदनाम बताते फिरते हो ये लम्पट जो गरज रहे क्या बरसेंगे क्यों हर घन घनश्याम बताते फिरते हो तुम अमीर हो बेशक़ हुस्न की दौलत से इश्क़ मगर क्यों आम बताते फिरते हो कुछ सुरेश समझो नाहक़ मधुशाला को नङ्गों का हम्माम बताते फिरते हो सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमने दुश्वारियों के हल खोजे उसने अपने सुनहरे कल खोजे।। इश्क़ तो झोंपड़ी में भी खुश है हुस्न बेशक़ बड़े महल खोजे।। उस क़यामत के मुन्तज़िर हैं हम खोजना है जिसे अज़ल खोजे।। हम निबाहेंगे खार से बेशक़ वो कोई गुल कोई कंवल खोजे।। आशिक़ी साहनी से मुश्किल है काम कह दो कोई सरल खोजे।। साहनी सुरेश कानपुर 9451545132
 दिल लगाने की तमन्ना रह गयी। उसको पाने की तमन्ना रह गयी।। प्यार का जो कोष उसके पास था उस खज़ाने की तमन्ना रह गयी ।। जीतना तो प्यार की फितरत नहीं हार जाने की तमन्ना रह गयी ।। जो ग़ज़ल उस पर कही थी इक दफा वो सुनाने  की तमन्ना रह गयी ।। संग  बीते वो न होती ज़िन्दगी पर बिताने  की तमन्ना रह गयी ।। ज़िन्दगी जलसा समझ कर साहनी थी मनाने  की तमन्ना रह गयी ।। साहनी सुरेश, कानपुर 9451545132
 चाहे जिस पाली में रखना। मुझको रखवाली में रखना।। खीर भले घर भर को बांटो प्यार मेरी थाली में रखना।।
 अब न रोयेंगे सिसकियाँ लेकर। ख़ूब जीयेंगे मस्तियाँ लेकर।। क्या किसी का निशान रहना है क्यों जियों हम निशानियाँ लेकर।। खाक़ दिल के करीब पहुँचेंगे हम दिमागों में दूरियाँ लेकर।। ग़म के दरियाब पार करने हैं वो भी कागज़ की कश्तियाँ लेकर।। इस ख़राबा में शोर कैसा हैं हम चले थे खमोशियाँ लेकर।। अब नशेमन नहीं तो डर कैसा लाख आयें वो बिजलियाँ लेकर।। ये दिये साहनी ने बाले हैं शौक़ से आओ आँधियाँ लेकर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज दुश्वार मैं लगा मुझको। यूँ गुनहगार मैं लगा मुझको।। दुश्मने-जान किसको ठहराऊं क्या कभी यार मैं लगा मुझको।। उसके एजाज में ग़ज़लगोई करके कुफ़्फ़ार मैं लगा मुझको।। सरनिगूँ था मैं आपके दर पर कब परस्तार  मैं लगा मुझको।। ग़ैर अपने भले लगे न लगे और अग्यार मैं लगा मुझको।। ऐ अनारो तुझे भले न लगे तेरा बीमार मैं लगा मुझको।। साहनी की ग़ज़ल अरे तौबा सच मे बेकार मैं लगा मुझको।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 प्रीति का नवगीत अर्पित मन तुम्हें मनमीत अर्पित हार कर सर्वस्व अपना कर रहा हूँ जीत अर्पित।। नभ ने अगणित तारकों से थाल पूजा के सजाये और बंदनवार कितने ऋतु ने उपवन में बनाये पंक्तिबद्धित स्वागतम हित रस्म अर्पित रीत अर्पित।।........ नभचरिय समवेत कलरव मंत्र मोहित कर रहा मन केलि कलियों से भ्रमर दल का पुलकित कर रहा तन ताल स्पंदन हृदय सह स्वास का संगीत अर्पित।।..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 उनकी सत्ता की रखवाली करनी है। हमको अपनी पॉकेट खाली करनी है।। हमको अपना धर्म बचाये रखना है तुमको मज़हब की रखवाली करनी है।। नामुमकिन है ग़ुरबत में इक अपना घर  फिर भी तुमको ख़्वाबख़्याली करनी है।। तुम सुरेश शायर हो कैसे सोच लिया अपूर्ण
 हम तुमपे माइल हो जायें चलता है। दिल से हम घायल हो जायें चलता है।। तुम पर तो है महफ़िल की ज़िम्मेदारी हम बेशक़ पागल हो जायें चलता है।। तुम बहकोगी सारा आलम डोलेगा अपना क्या बेकल हो जायें चलता है।। अपूर्ण
 वसन ऊजरे पहने तन पर मन के काले लोग। अंदर से शातिर पर दिखते भोले भाले  लोग।। चरण चाटते क्रांति के नारे देते मिलते हैं ऊँट की चोरी निहुरे निहुरे करने वाले लोग।। सुरेश साहनी, कानपुर
 वो कह रहा था मुझे देवता बनायेगा। कहाँ पता था मेरे नाम से कमाएगा।। वो मानता है मुझे मेरी मानता कब है बहुत करेगा मेरा नाम बेच  खायेगा।।साहनी