वो हसीं रात फिर कभी न हुयी। आपसे बात फिर कभी न हुयी।। साथ बारिश में भीगना तय था यूँ के बरसात फिर कभी न हुयी।।
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क्या ज़रूरी है ओहदे पर हो। तुम किसी हाल में मोहतबर हो।। प्यार रिश्तों में हो ज़रूरी है फिर महल हो कि फूस का घर हो ।। चाँद तारों की क्या ज़रूरत है जीस्त जब प्यार से मुनव्वर हो।। हम हैं उल्फत के आस्ताने से कोई बेशक़ बड़ा सिकन्दर हो।। साहनी कौन जानता है तुम्हें अब न कहना कि तुम सुख़नवर हो।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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यदि जनता के साथ चलें तो सरकारों का गिरना तय है आज मशीनों का बहुमत है जनता का मत क्या मतलब है सब कुछ पूँजी से होना है सब हों सहमत क्या मतलब है सत्ता की ताकत को समझो हर विरोध का मरना तय है तुम करते थे चोरी थी जो हम करते है अब विकास है आओ साथ नहा लो गंगा उन्नति का ग्लोबल प्रयास है हरिश्चन्द्र अब क्या कर लेंगे रोहिताश्व का मरना तय है..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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हमें हम छोड़कर बढ़ने लगे हैं। कई इस बात से कुढ़ने लगे हैं।। बहुत पछताए उन पर कहके गज़लें हमी सुनने हमीं पढ़ने लगे हैं।। लगे है जा चुका है दौर अपना हमें सब फ्रेम में जड़ने लगे हैं।। ये डर है बदगुमां करदे न शोहरत हवा में कुछ तो हम उड़ने लगे हैं।। कभी था साहनी भी एक शायर मगर अब सब उसे पढ़ने लगे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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कब न थे कब थे हमारी ज़िन्दगी के मायने। आप कब समझे हमारी किस खुशी के मायने।। मेरे जीते जी न समझा जो हमारे दर्द को क्या समझता फिर हमारी खुदकुशी के मायने।। हुस्न वालों को पता है हुस्न की रांनाईयाँ इश्क़ वाले जानते हैं आशिक़ी के मायने।। जिस ख़ुदा की राह में मरता रहा है आदमी क्या पता है उस ख़ुदा को बन्दगी के मायने।। हम से बेपर्दा हुआ जो क़ुर्बतों के नाम पर वो हमें समझा रहा है पर्दगी के मायने।। जो चरागों को बुझाने में हवा के साथ थे क्या बतायेंगे हमें वो रोशनी के मायने।। कितनी दरियाओं का पानी पी रहा है रात दिन इक समन्दर को पता है तिश्नगी के मायने।। सुरेश साहनी, कानपुर
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शब्द शब्द से हुए पराये अक्षर अक्षर से ही रूठे। मैं भी गीत कहाँ से लिखता भाव कहाँ से लाता झूठे।। जब तुम थे ऐसा लगता था जैसे मुझको सब हासिल है कविता कहना कठिन नहीं है गीत सजाना कब मुश्किल है ये सब मेरे खेल खिलौने छूट गए तब जब तुम छूटे।। अक्षर ब्रम्ह जगत मिथ्या पर शब्द सशक्त कहे जाते है किन्तु वियोगी-पद लेते ही भाव विरक्त हुए जाते हैं होती सफल साधना कैसे ,सारे पुण्य समय ने लूटे।। खण्ड खण्ड हो गयी सृजनता महाकाव्य रह गए अधूरे जीवन की चलती चाकी में शेष बचे गीतों के चूरे टेक तुम्हारी पकड़ बच गए तुलसी से दो एक अनूठे।। सुरेशसाहनी
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मैं हैरां हूँ कि मैं इस दौर में हूँ। गनीमत है कि अब भी दौड़ में हूँ।। यहाँ अब जिंदगी जद्दोजहद है मैं अपने आप से ही होड़ में हूँ।। ग़नीमत है कि मेरा वोट भी है नहीं तो मैं कहाँ किस जोड़ में हूँ।। मुझे इंसान कब समझा किसी ने सभी के वास्ते मैं और में हूँ।। मैं इंसां हूँ इसी से मर रहा हूँ मैं दिल्ली में हूँ या लाहौर में हूँ।। सुरेशसाहनी
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माँ की दो रोटी में जैसे जग का प्यार छुपा रहता था भूख नहीं होती थी तब भी स्वतः भूख जागा करती थी अब भी दो रोटी आती है किंतु औपचारिकताओं से पूरित स्नेह स्वार्थ मिश्रण अभिगुँथित बड़े सलीके से उच्चारित कह दो तो दो और बना दूँ कैसे कह दूँ सोच रहा हूँ भूख मिट गई पेट भर गया फिर भी ऐसा क्यों लगता है मन जैसे संतृप्त नहीं है पढ़े लिखे हैं शिक्षित घर हैं सुविधाओं की कमी नहीं है अब चूल्हों में धुंआ नहीं है सोच रहा हूँ फिर से घर मे मिट्टी का चूल्हा ले आऊँ माँ तेरे खुरदुरे हाथ भी कितने नरम नरम लगते थे शायद उनमे नेल नहीं थे नोक नुकीले पॉलिश वाले मां अनपढ़ थी पर अच्छी थी..... सुरेशसाहनी, कानपुर
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न सँवर सके न सुधर सके गए तुम तो हम भी गुज़र गए तेरे साथ जितना चले चले तेरे बाद जैसे ठहर गए।। तेरी तरह हम न बदल सके रहे जैसे वैसे ही रह गये तेरे साथ चलना था दो कदम तेरे बाद थम के ही रह गये कभी मंज़िलों ने भुला दिया कभी छोड़ राहगुज़र गए।। न सँवर...... तुम्हें देखना है तो देख लो यहीं पास अपनी मज़ार है दो घड़ी सुकून से बैठ लो वो ख़मोशियों का दयार है फ़क़त इसलिए कि पता रहे जो अदीब थे वो किधर गए।।न सँवर...... यहाँ आके आँखें न नम करो तुम्हें किसने बोला कि ग़म करो जिसे प्यार था वो चला गया तो क्यों पत्थरों को सनम करो जो असीर थे वो नहीं रहे तेरे हुस्न के भी असर गए।।न सँवर......
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मैं गंगा हूँ-2 तन से शीतल ,मन से निर्मल धोती हूँ जन जन के कलिमल शिव ने धारा है मस्तक पर आवाहन करता है सागर मत समझो मैं सिर्फ नदी हूँ पाप नाशिनी विष्णुपदी हूँ... गोमुख से गंगा सागर तक बहती आयी हूँ निष्कंटक भारत की जीवन धारा हूँ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा हूँ तर्पण और वजू का जल हूँ आबे-जमजम गंगाजल हूँ..... मेरा मन तबसे टूटा है अपनों ने मुझको लूटा है मेरा जल चोरी होता है प्यासों को बेचा जाता है और मेरी अपनी संताने बाँध रहीं जाने अनजाने..... खुश थी मैं आयी आज़ादी पर मुझको बेड़ी पहना दी मैं उन्मुक्त सरल आनन्दी अपने ही घर मे हूँ बंदी बेटे माँ को छोड़ रहे हैं मेरी धारा मोड़ रहे हैं..... अब ये सांसे छूट रही है मेरी हम्मत टूट रही है गन्दा जहर प्रदूषित पानी कचड़ा मलवा नाला नाली यह विनती है सुन लो बेटों मुझमें मिलने गिरने मत दो सीधी ज़हर ख़ुरानी रोको इन नालों का पानी रोको जगह जगह मुझको मत बांधो मेरे सब अवरोध हटा दो
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अगर दिलजू नहीं आये चलेगा तो दिल काबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत सीख लो इतना बहुत है कोई जादू नहीं आये चलेगा ये है काग़ज़ के फूलों का ज़माना कोई खुशबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत हम की हस्ती में निहाँ है यहाँ मैं तू नहीं आये चलेगा ज़ुबाँ दिल की ज़रूरी है सुखन को भले उर्दू नहीं आये चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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वो हमारे सनम नहीं थे जब क्या नहीं था कि हम नहीं थे जब उस ख़ुदा का कहाँ ठिकाना था इतने दैरोहरम नहीं थे जब।। तब वो जन्नत ज़मीन पर थी क्या पंथ मज़हब धरम नहीं थे जब।। पीने वाले कहाँ थे दुनिया में तब सुराही के खम नहीं थे जब।। इश्क़ होगा ये मान लें कैसे तेरी दुनिया में ग़म नहीं थे जब।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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यूँ भी आतिश पनाह होना है। एक दिन सब तबाह होना है।। हुस्न काजल की कोठरी ठहरा साफ दामन सियाह होना है।। क्या करेगा निगाह शाइस्ता क्या तुझे बदनिगाह होना है।। अब नवाजा है मेरे मुर्शिद ने घर मिरा ख़ानक़ाह होना है।। जिस के सिर पर हो हाथ संजर का एकदिन उसको शाह होना है।। आशिक़ी और फिर ग़ज़लगोई साहनी को तबाह होना है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ। अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।। ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।। किसी को जीत कर भी क्या करूँगा मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।। बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।। निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।। न आएगी सुबह मधुयामिनी की अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।
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जिसको सुनने की साध रही जिसकी लालसा अगाध रही वह बात नहीं तुम कह पाये वह बात कहाँ हम सुन पाये।। ऐ काश कभी हम चल पाते उस पथ पर जिस पर चल न सके मिलने की चाह लिए बिछुड़े ऐसे बिछुड़े फिर मिल न सके तुमने थामी विपरीत डगर हम भी भटके दूजे पथ पर किंचित इसकी थी यही नियति कब कुसुम टूट कर खिल पाये दो कदम चले हम साथ साथ पर जग को साथ नहीं भाया जाने क्यों अपनों को अपना हाथों में हाथ नहीं भाया सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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आज के दिन थप्पड़ मत मारो बाबूजी। मजदूरों का हक़ मत मारो बाबूजी ।। आप ने बोला था झण्डा फहराना है साथ में अपने कुछ लोगों को लाना है आपकी जय का नारा भी लगवाना है जैसा कहा किया स्वीकारो बाबू जी।। आज के..... आपने बोला था तुमको खर्चा देंगे चाय समोसा दो दो सौ रुपया देंगे आने जाने का सबको भाड़ा देंगे मरे हुओं का हक मत मारो बाबू जी।।आज के...... सुबह के भूखे हैं हम दम से बेदम हैं आपने चांपा मेवा मिसरी चमचम है अपने भी नन्हे बच्चे हैं मैडम हैं घर जाने लायक दे डारो बाबूजी।। आज के... सुरेशसाहनी
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वेदने अब मौन रहना सीख लो हैं कुटिल खूंखार अब संवेदनायें क्या करोगे कौन सुनता हैं व्यथायें सब हँसेंगे जोड़कर अथ वा तथायें लाख तुम निर्दोष या निश्छल रहोगे लोग गढ़ लेंगे कई कुत्सित कथायें चुप न हो बस कुछ न कहना सीख लो अब नहीं सुनती बधिर आत्मीयतायें....... दर्द बांटेगा कोई यह भूल जाओ हर व्यथा हर पीर को उर में छिपाओ बाँटने से पीर बँटती भी नहीं है व्यर्थ अपने आँसुओं को मत लुटाओ प्रेम में चुपचाप दहना सीख लो फिर नहीं मिलनी हैं ये वन वीथिकाएँ ...... .देख क्या अल्हड़ नदी की आज गति है पञ्च कुल्या बन के बंटना ही प्रगति है उम्र ढलती जा रही है आत्ममुग्धे कर वरण अब सिंधु खारा ही नियति है सोच मत वे छिछले सर जो छली थे कर्म परिणति थी वे सड़ कर सूख जायें.......
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तुम क्या क्या अन्जाम बताते फिरते हो रावण को भी राम बताते फिरते हो उल्फत के परिणाम बताते फिरते हो तुम किनको नाकाम बताते फिरते हो भोले हो तुम सचमुच दिल के मसलों में हर छलिया को श्याम बताते फिरते हो दुनिया उनके अफसाने दोहराती है तुम जिनको बदनाम बताते फिरते हो ये लम्पट जो गरज रहे क्या बरसेंगे क्यों हर घन घनश्याम बताते फिरते हो तुम अमीर हो बेशक़ हुस्न की दौलत से इश्क़ मगर क्यों आम बताते फिरते हो कुछ सुरेश समझो नाहक़ मधुशाला को नङ्गों का हम्माम बताते फिरते हो सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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दिल लगाने की तमन्ना रह गयी। उसको पाने की तमन्ना रह गयी।। प्यार का जो कोष उसके पास था उस खज़ाने की तमन्ना रह गयी ।। जीतना तो प्यार की फितरत नहीं हार जाने की तमन्ना रह गयी ।। जो ग़ज़ल उस पर कही थी इक दफा वो सुनाने की तमन्ना रह गयी ।। संग बीते वो न होती ज़िन्दगी पर बिताने की तमन्ना रह गयी ।। ज़िन्दगी जलसा समझ कर साहनी थी मनाने की तमन्ना रह गयी ।। साहनी सुरेश, कानपुर 9451545132
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अब न रोयेंगे सिसकियाँ लेकर। ख़ूब जीयेंगे मस्तियाँ लेकर।। क्या किसी का निशान रहना है क्यों जियों हम निशानियाँ लेकर।। खाक़ दिल के करीब पहुँचेंगे हम दिमागों में दूरियाँ लेकर।। ग़म के दरियाब पार करने हैं वो भी कागज़ की कश्तियाँ लेकर।। इस ख़राबा में शोर कैसा हैं हम चले थे खमोशियाँ लेकर।। अब नशेमन नहीं तो डर कैसा लाख आयें वो बिजलियाँ लेकर।। ये दिये साहनी ने बाले हैं शौक़ से आओ आँधियाँ लेकर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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आज दुश्वार मैं लगा मुझको। यूँ गुनहगार मैं लगा मुझको।। दुश्मने-जान किसको ठहराऊं क्या कभी यार मैं लगा मुझको।। उसके एजाज में ग़ज़लगोई करके कुफ़्फ़ार मैं लगा मुझको।। सरनिगूँ था मैं आपके दर पर कब परस्तार मैं लगा मुझको।। ग़ैर अपने भले लगे न लगे और अग्यार मैं लगा मुझको।। ऐ अनारो तुझे भले न लगे तेरा बीमार मैं लगा मुझको।। साहनी की ग़ज़ल अरे तौबा सच मे बेकार मैं लगा मुझको।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
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प्रीति का नवगीत अर्पित मन तुम्हें मनमीत अर्पित हार कर सर्वस्व अपना कर रहा हूँ जीत अर्पित।। नभ ने अगणित तारकों से थाल पूजा के सजाये और बंदनवार कितने ऋतु ने उपवन में बनाये पंक्तिबद्धित स्वागतम हित रस्म अर्पित रीत अर्पित।।........ नभचरिय समवेत कलरव मंत्र मोहित कर रहा मन केलि कलियों से भ्रमर दल का पुलकित कर रहा तन ताल स्पंदन हृदय सह स्वास का संगीत अर्पित।।..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132