ये सोचकर कि सवेरे का क्या भरोसा है घनेरी रात को पूरी तरह जिया मैंने।।साहनी
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Showing posts from February, 2026
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शब्द शब्द से हुए पराये अक्षर अक्षर से ही रूठे। मैं भी गीत कहाँ से लिखता भाव कहाँ से लाता झूठे।। जब तुम थे ऐसा लगता था जैसे मुझको सब हासिल है कविता कहना कठिन नहीं है गीत सजाना कब मुश्किल है ये सब मेरे खेल खिलौने छूट गए तब जब तुम छूटे।। अक्षर ब्रम्ह जगत मिथ्या पर शब्द सशक्त कहे जाते है किन्तु वियोगी-पद लेते ही भाव विरक्त हुए जाते हैं होती सफल साधना कैसे ,सारे पुण्य समय ने लूटे।। खण्ड खण्ड हो गयी सृजनता महाकाव्य रह गए अधूरे जीवन की चलती चाकी में शेष बचे गीतों के चूरे टेक तुम्हारी पकड़ बच गए तुलसी से दो एक अनूठे।। सुरेशसाहनी
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मैं हैरां हूँ कि मैं इस दौर में हूँ। गनीमत है कि अब भी दौड़ में हूँ।। यहाँ अब जिंदगी जद्दोजहद है मैं अपने आप से ही होड़ में हूँ।। ग़नीमत है कि मेरा वोट भी है नहीं तो मैं कहाँ किस जोड़ में हूँ।। मुझे इंसान कब समझा किसी ने सभी के वास्ते मैं और में हूँ।। मैं इंसां हूँ इसी से मर रहा हूँ मैं दिल्ली में हूँ या लाहौर में हूँ।। सुरेशसाहनी
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माँ की दो रोटी में जैसे जग का प्यार छुपा रहता था भूख नहीं होती थी तब भी स्वतः भूख जागा करती थी अब भी दो रोटी आती है किंतु औपचारिकताओं से पूरित स्नेह स्वार्थ मिश्रण अभिगुँथित बड़े सलीके से उच्चारित कह दो तो दो और बना दूँ कैसे कह दूँ सोच रहा हूँ भूख मिट गई पेट भर गया फिर भी ऐसा क्यों लगता है मन जैसे संतृप्त नहीं है पढ़े लिखे हैं शिक्षित घर हैं सुविधाओं की कमी नहीं है अब चूल्हों में धुंआ नहीं है सोच रहा हूँ फिर से घर मे मिट्टी का चूल्हा ले आऊँ माँ तेरे खुरदुरे हाथ भी कितने नरम नरम लगते थे शायद उनमे नेल नहीं थे नोक नुकीले पॉलिश वाले मां अनपढ़ थी पर अच्छी थी..... सुरेशसाहनी, कानपुर
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न सँवर सके न सुधर सके गए तुम तो हम भी गुज़र गए तेरे साथ जितना चले चले तेरे बाद जैसे ठहर गए।। तेरी तरह हम न बदल सके रहे जैसे वैसे ही रह गये तेरे साथ चलना था दो कदम तेरे बाद थम के ही रह गये कभी मंज़िलों ने भुला दिया कभी छोड़ राहगुज़र गए।। न सँवर...... तुम्हें देखना है तो देख लो यहीं पास अपनी मज़ार है दो घड़ी सुकून से बैठ लो वो ख़मोशियों का दयार है फ़क़त इसलिए कि पता रहे जो अदीब थे वो किधर गए।।न सँवर...... यहाँ आके आँखें न नम करो तुम्हें किसने बोला कि ग़म करो जिसे प्यार था वो चला गया तो क्यों पत्थरों को सनम करो जो असीर थे वो नहीं रहे तेरे हुस्न के भी असर गए।।न सँवर......
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मैं गंगा हूँ-2 तन से शीतल ,मन से निर्मल धोती हूँ जन जन के कलिमल शिव ने धारा है मस्तक पर आवाहन करता है सागर मत समझो मैं सिर्फ नदी हूँ पाप नाशिनी विष्णुपदी हूँ... गोमुख से गंगा सागर तक बहती आयी हूँ निष्कंटक भारत की जीवन धारा हूँ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा हूँ तर्पण और वजू का जल हूँ आबे-जमजम गंगाजल हूँ..... मेरा मन तबसे टूटा है अपनों ने मुझको लूटा है मेरा जल चोरी होता है प्यासों को बेचा जाता है और मेरी अपनी संताने बाँध रहीं जाने अनजाने..... खुश थी मैं आयी आज़ादी पर मुझको बेड़ी पहना दी मैं उन्मुक्त सरल आनन्दी अपने ही घर मे हूँ बंदी बेटे माँ को छोड़ रहे हैं मेरी धारा मोड़ रहे हैं..... अब ये सांसे छूट रही है मेरी हम्मत टूट रही है गन्दा जहर प्रदूषित पानी कचड़ा मलवा नाला नाली यह विनती है सुन लो बेटों मुझमें मिलने गिरने मत दो सीधी ज़हर ख़ुरानी रोको इन नालों का पानी रोको जगह जगह मुझको मत बांधो मेरे सब अवरोध हटा दो
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अगर दिलजू नहीं आये चलेगा तो दिल काबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत सीख लो इतना बहुत है कोई जादू नहीं आये चलेगा ये है काग़ज़ के फूलों का ज़माना कोई खुशबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत हम की हस्ती में निहाँ है यहाँ मैं तू नहीं आये चलेगा ज़ुबाँ दिल की ज़रूरी है सुखन को भले उर्दू नहीं आये चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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वो हमारे सनम नहीं थे जब क्या नहीं था कि हम नहीं थे जब उस ख़ुदा का कहाँ ठिकाना था इतने दैरोहरम नहीं थे जब।। तब वो जन्नत ज़मीन पर थी क्या पंथ मज़हब धरम नहीं थे जब।। पीने वाले कहाँ थे दुनिया में तब सुराही के खम नहीं थे जब।। इश्क़ होगा ये मान लें कैसे तेरी दुनिया में ग़म नहीं थे जब।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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यूँ भी आतिश पनाह होना है। एक दिन सब तबाह होना है।। हुस्न काजल की कोठरी ठहरा साफ दामन सियाह होना है।। क्या करेगा निगाह शाइस्ता क्या तुझे बदनिगाह होना है।। अब नवाजा है मेरे मुर्शिद ने घर मिरा ख़ानक़ाह होना है।। जिस के सिर पर हो हाथ संजर का एकदिन उसको शाह होना है।। आशिक़ी और फिर ग़ज़लगोई साहनी को तबाह होना है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ। अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।। ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।। किसी को जीत कर भी क्या करूँगा मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।। बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।। निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।। न आएगी सुबह मधुयामिनी की अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।