कब तक दौड़े कितना भागे।

कितना सोचे कब तक जागे।।

और कोई तो सीमा होगी

भरे छलांगें  कितना आगे।।

भाव के घाव निसह दुखदाई

वो ही जाने जिस तन लागे।।

ख़ाक में ख़ाक मिलेगी फिर क्या

मन भर फूंके जी भर दागे।।

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