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Showing posts from January, 2026
 गान्धी तुम्हे ज़रूरत क्या थी ऐसी धरती पर आने की सत्य अहिंसा दया क्षमा सब हों अक्षम्य अपराध जहाँ पर पर तुम भी अहमक़ थे शायद उन अंग्रेजों से लड़ बैठे जो तुमको आदर देते थे और लड़े भी किनकी ख़ातिर उनकी ख़ातिर समझ गए ना?
 जिसको सुनने की साध रही जिसकी लालसा अगाध रही वह बात नहीं तुम कह पाये  वह बात कहाँ हम सुन पाये।। ऐ काश कभी हम चल पाते उस पथ पर जिस पर चल न सके मिलने की चाह लिए बिछुड़े ऐसे बिछुड़े फिर मिल न सके तुमने थामी विपरीत डगर हम भी भटके दूजे पथ पर किंचित इसकी थी यही नियति कब कुसुम टूट कर खिल पाये दो कदम चले हम  साथ साथ पर जग को साथ नहीं भाया जाने क्यों अपनों को अपना हाथों में हाथ नहीं भाया सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज के दिन थप्पड़ मत मारो बाबूजी। मजदूरों का हक़  मत मारो बाबूजी ।। आप ने बोला था झण्डा फहराना है साथ में अपने कुछ लोगों को लाना है आपकी जय का नारा भी लगवाना है जैसा कहा किया स्वीकारो बाबू जी।। आज के..... आपने बोला था तुमको खर्चा देंगे चाय समोसा दो दो सौ रुपया देंगे आने जाने का सबको भाड़ा देंगे मरे हुओं का हक मत मारो बाबू जी।।आज के...... सुबह के भूखे हैं हम दम से बेदम हैं आपने चांपा मेवा मिसरी चमचम है अपने भी नन्हे बच्चे हैं मैडम हैं घर जाने लायक दे डारो बाबूजी।। आज के... सुरेशसाहनी
 वेदने अब मौन रहना सीख लो हैं कुटिल खूंखार अब संवेदनायें क्या करोगे कौन सुनता हैं व्यथायें सब हँसेंगे जोड़कर अथ वा तथायें लाख तुम निर्दोष या निश्छल रहोगे लोग गढ़ लेंगे कई कुत्सित कथायें चुप न हो बस कुछ न कहना सीख लो अब नहीं सुनती बधिर आत्मीयतायें....... दर्द बांटेगा कोई यह भूल जाओ हर व्यथा हर पीर को उर में छिपाओ बाँटने से पीर बँटती भी नहीं है व्यर्थ अपने आँसुओं को मत लुटाओ प्रेम में चुपचाप दहना सीख लो फिर नहीं मिलनी हैं ये वन वीथिकाएँ ...... .देख क्या अल्हड़ नदी की आज गति है पञ्च कुल्या बन के बंटना ही प्रगति है उम्र ढलती जा रही है आत्ममुग्धे कर वरण अब सिंधु खारा ही नियति है सोच मत वे छिछले सर जो छली थे कर्म परिणति थी वे सड़ कर सूख जायें.......
 यूँ तो ख़्वाबो-ख़याल में थी कल। फिर न जाने कहाँ गयी वो ग़ज़ल।। मरमरी मरमरी थे शेर उसके वो ग़ज़ल थी कि कोई ताजमहल।।साहनी
 तुम क्या क्या अन्जाम बताते फिरते हो रावण को भी राम बताते फिरते हो उल्फत के परिणाम बताते फिरते हो तुम किनको नाकाम बताते फिरते हो भोले हो तुम सचमुच दिल के मसलों में हर छलिया को श्याम बताते फिरते हो दुनिया उनके अफसाने दोहराती है तुम जिनको बदनाम बताते फिरते हो ये लम्पट जो गरज रहे क्या बरसेंगे क्यों हर घन घनश्याम बताते फिरते हो तुम अमीर हो बेशक़ हुस्न की दौलत से इश्क़ मगर क्यों आम बताते फिरते हो कुछ सुरेश समझो नाहक़ मधुशाला को नङ्गों का हम्माम बताते फिरते हो सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमने दुश्वारियों के हल खोजे उसने अपने सुनहरे कल खोजे।। इश्क़ तो झोंपड़ी में भी खुश है हुस्न बेशक़ बड़े महल खोजे।। उस क़यामत के मुन्तज़िर हैं हम खोजना है जिसे अज़ल खोजे।। हम निबाहेंगे खार से बेशक़ वो कोई गुल कोई कंवल खोजे।। आशिक़ी साहनी से मुश्किल है काम कह दो कोई सरल खोजे।। साहनी सुरेश कानपुर 9451545132
 दिल लगाने की तमन्ना रह गयी। उसको पाने की तमन्ना रह गयी।। प्यार का जो कोष उसके पास था उस खज़ाने की तमन्ना रह गयी ।। जीतना तो प्यार की फितरत नहीं हार जाने की तमन्ना रह गयी ।। जो ग़ज़ल उस पर कही थी इक दफा वो सुनाने  की तमन्ना रह गयी ।। संग  बीते वो न होती ज़िन्दगी पर बिताने  की तमन्ना रह गयी ।। ज़िन्दगी जलसा समझ कर साहनी थी मनाने  की तमन्ना रह गयी ।। साहनी सुरेश, कानपुर 9451545132
 चाहे जिस पाली में रखना। मुझको रखवाली में रखना।। खीर भले घर भर को बांटो प्यार मेरी थाली में रखना।।
 अब न रोयेंगे सिसकियाँ लेकर। ख़ूब जीयेंगे मस्तियाँ लेकर।। क्या किसी का निशान रहना है क्यों जियों हम निशानियाँ लेकर।। खाक़ दिल के करीब पहुँचेंगे हम दिमागों में दूरियाँ लेकर।। ग़म के दरियाब पार करने हैं वो भी कागज़ की कश्तियाँ लेकर।। इस ख़राबा में शोर कैसा हैं हम चले थे खमोशियाँ लेकर।। अब नशेमन नहीं तो डर कैसा लाख आयें वो बिजलियाँ लेकर।। ये दिये साहनी ने बाले हैं शौक़ से आओ आँधियाँ लेकर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज दुश्वार मैं लगा मुझको। यूँ गुनहगार मैं लगा मुझको।। दुश्मने-जान किसको ठहराऊं क्या कभी यार मैं लगा मुझको।। उसके एजाज में ग़ज़लगोई करके कुफ़्फ़ार मैं लगा मुझको।। सरनिगूँ था मैं आपके दर पर कब परस्तार  मैं लगा मुझको।। ग़ैर अपने भले लगे न लगे और अग्यार मैं लगा मुझको।। ऐ अनारो तुझे भले न लगे तेरा बीमार मैं लगा मुझको।। साहनी की ग़ज़ल अरे तौबा सच मे बेकार मैं लगा मुझको।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 प्रीति का नवगीत अर्पित मन तुम्हें मनमीत अर्पित हार कर सर्वस्व अपना कर रहा हूँ जीत अर्पित।। नभ ने अगणित तारकों से थाल पूजा के सजाये और बंदनवार कितने ऋतु ने उपवन में बनाये पंक्तिबद्धित स्वागतम हित रस्म अर्पित रीत अर्पित।।........ नभचरिय समवेत कलरव मंत्र मोहित कर रहा मन केलि कलियों से भ्रमर दल का पुलकित कर रहा तन ताल स्पंदन हृदय सह स्वास का संगीत अर्पित।।..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 उनकी सत्ता की रखवाली करनी है। हमको अपनी पॉकेट खाली करनी है।। हमको अपना धर्म बचाये रखना है तुमको मज़हब की रखवाली करनी है।। नामुमकिन है ग़ुरबत में इक अपना घर  फिर भी तुमको ख़्वाबख़्याली करनी है।। तुम सुरेश शायर हो कैसे सोच लिया अपूर्ण
 हम तुमपे माइल हो जायें चलता है। दिल से हम घायल हो जायें चलता है।। तुम पर तो है महफ़िल की ज़िम्मेदारी हम बेशक़ पागल हो जायें चलता है।। तुम बहकोगी सारा आलम डोलेगा अपना क्या बेकल हो जायें चलता है।। अपूर्ण
 वसन ऊजरे पहने तन पर मन के काले लोग। अंदर से शातिर पर दिखते भोले भाले  लोग।। चरण चाटते क्रांति के नारे देते मिलते हैं ऊँट की चोरी निहुरे निहुरे करने वाले लोग।। सुरेश साहनी, कानपुर
 वो कह रहा था मुझे देवता बनायेगा। कहाँ पता था मेरे नाम से कमाएगा।। वो मानता है मुझे मेरी मानता कब है बहुत करेगा मेरा नाम बेच  खायेगा।।साहनी