ग़ज़ल के शिल्प में बेशक कमी है।
ग़ज़ल लेकिन बहुत अच्छी हुई है ।।
इधर है संस्कृत अरबी उधर है
ग़ज़ल गोया तसद्दुद में फँसी है।।
लगे हैं सब नया इक नाम दें दें
ग़ज़ल है गीतिका है तेवरी है।।
पराई किस नज़र से मान लें हम
ग़ज़ल माँ भारती की ही जनी है।।
कहेंगे सब भले माने न माने
सुना है इक गज़लगो साहनी है।।
सुरेश साहनी, कानपुर
9451545132
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