मुझे नज़दीक से आकर न देखो
दरक सकती है वो तस्वीर जो कि
तुम्हारे मन में इतनी खूबसूरत 
न जाने किस तरह से बन गयी है
असल में मैं बहुत अच्छा नहीं हूँ

मग़र इतना बुरा भी मैं नहीं हूँ
मुझे जितना बुरा मैं सोचता हूँ
सभी के वास्ते दुःख और सुख में
जहाँ तक हो सके रहता हूँ शामिल
हमारे घर गृहस्थी की जरूरत-
में जो कुछ चाहिए उनको निभाकर
हमारी जेब से कुछ बच बचाकर
जहाँ तक हो सके करता रहा हूँ
हमारी सोच है आकाश जितनी
भले इक छत में सिमटा जा रहा हूँ
मेरी मजबूरियां मैं जानता हूँ
न जाने फिर भी क्यों शरमा रहा हूँ

मैं जैसा दिख रहा हूँ वो नहीं हूँ
मैं जैसा हूँ मैं वैसा ही रहूँगा
मेरी तस्वीर ऐसी ही बना लो
मुझे नज़दीक से तब  देख लेना
अभी नज़दीक से आकर न देखो....
सुरेशसाहनी, अदीब

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