इन फ़िज़ाओं में सनसनी क्यों है।

ज़ीस्त इतनी भी अनमनी क्यों हैं।।

किसलिए  है  बुझा बुझा  सूरज

तीरगी   तुझमें   रोशनी क्यों है।।

तेरा  दावा है     गर खरेपन का

तेरी  बातों में  चाशनी क्यों है ।।  

आज चौदह की रात है फिर भी

इतनी गुमसुम सी चांदनी क्यों है।।

जो खफा होके मुस्कराता हो

उसकी भौंहे तनी तनी क्यों है।।

रोज सादा लिबास रहती थी

वक़्ते-रुखसत बनी ठनी क्यों है।।

Suresh Sahani Kanpur

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