फेसबुकिया कवियों के स्तर को लेकर बहुत सारी समीक्षाएं ,आलोचनाएँ पढ़ने को मिलती है ।कई मित्र तो आग्रह से टिप्पणी मांगते है ।मैं इसे साहित्यिक विकास का एक चरण मानता हूँ ।हो सकता है की कविता के व्याकरण के पैमानों को ये कवितायेँ न पूरी करती हों ,किन्तु उनका भाव-सम्प्रेषण सफल होता है ।जो वह कहना चाहते है वह समझने योग्य और दिल पर असर डालने में सफल होता है ।ऐसी ही एक कविता प्रस्तुत है ,-

गुड़ फूस और घास ।

यही है  च्यवनप्राश ।।


अन्ना का प्रयास ।

बदल दो इतिहास ।।


खरगोश करे राज ,

और शेर खाए घास ।।


 हमारी अम्मा अम्मा ,

उनकी अम्मा   सास ।।--खानदानी कवि छपास दीवाना

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