सचमुच याद कहाँ आते हैं भूले बिसरे लोग। याद मगर आते हैं अपने दिल में उतरे लोग।। लम्बा एक सफ़र है जीवन अगणित स्टेशन हैं याद किसे है मिले राह में यूँ तो अगणित जन हैं मनु के पहले कितने कितने बाद में गुज़रे लोग।। सब करते हैं गलत बयानी या मुँहदेखी बातें सब जीते हैं अपने ही दिन खोकर अपनी रातें और चढ़ाकर मिलते हैं चेहरों पर चेहरे लोग।। तुम तो याद नहीं हो आते याद तुम्हारे धोखे गढ़ लेते हैं किंतु प्रेम के हम भी चित्र अनोखे ख़ुद को ही छलते हैं गढ़कर स्वप्न सुनहरे लोग।। मृत्यु अटल है मृत्यु सत्य है याद किसे है भैया सिर्फ़ स्वार्थ के रिश्तों में हम सब कुछ भूले भैया अपने ही किरदारों में हम दुहरे तिहरे लोग।। सुरेश साहनी, कानपुर
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आप को भी धमाल आते हैं। और क्या क्या कमाल आते हैं।। आप मौका निकालते हैं या मौके खुद को निकाल आते हैं।। जब भी साहिल पे ऊब होती है हम समन्दर उछाल आते हैं।। तुमने देखा है चश्मेनम हमको हम लहू तक उबाल आते हैं।। अपने सपनों को बेचते हैं हम तब तो दिरहम रियाल आते हैं।। वो मेरे मुल्क़ के मसीहा हैं उनको कितने बवाल आते हैं।। ज़िन्दगी रोज़ ज़ख़्म देती है रोज़ हम दर्द टाल आते हैं।। हमको इन डेज़ में यक़ीन नहीं ये जो हर एक साल आते हैं।। साहनी के जेह्न में कुछ तो है शेर क्या बेमिसाल आते हैं।। साहनी,सुरेश कानपुर 9451545132
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एक दारूबाज को पुलिस का सिपाही डपट कर बोला, -क्या कर रहा है बे? दारूबाज ने अपने अंदाज में लहराते हुए कहा,-तुम्हारी तनख़्वाह का इंतज़ाम कर रहा हूँ। आप इसे मजाक में ले सकते हैं।किन्तु मैं गम्भीर हूँ। एक दिन मेरी तरह जनता भी गम्भीरता से चिंतन करेगी।लेकिन हैरानी की बात है कि वर्षों से जनता इसे केवल मजाक में ही ले रही है।हाँ कुछ लोग दुखिया दास बने समाज की चिंता में जागते रहते हैं।ऐसे लोग सदैव दुखी ही रहते हैं।।कांग्रेस के टाइम में भी परेशान रहे।उन्हें लोकतंत्र खतरे में ही दिखता रहा। वे काकस, करप्सन , और काला धन पर चिंतित रहे।जनलोकपाल मांगते रहे।उन्हें किसी भी दल की सरकार में कुछ सकारात्मक नही लगा और अब भी नही लगता है।मैंने कई कॉमरेडों को देखा है कि वे कॉमरेडों को ही गरियाते रहते हैं।उनका गुस्सा तभी खत्म होता है जब उनकी सुविधाओं का इंतज़ाम हो जाता है।या वे पुलिस की तनख्वाह का इंतज़ाम कर लेते हैं। लेकिन पुलिस ही क्यों हम तो पूरी सरकार को चलाने का इंतज़ाम करते हैं। अब ये जान के ऐठने मत लगना, नही तो सलवारी बाबा बना दिए जाओगे।माल्या की तरह भाग भी नही पाओगे। वैसे बाकी जनता समझदार है।शायद इसी...
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इतिहास मेरा प्रिय विषय रहा है।लेकिन फंतासी,किंवदंतियां,और पौराणिक कथाएं मुझे सरलता से याद हुयीं।कारण साफ था , इनमें तिथियां याद करने का झमेला नहीं रहा।कहीं से कुछ भी उठाकर बोल दो कोई सवाल नहीं खड़ा होता।मैं खुद लोगों को ऐसी दंतकथाएं सुनाता रहता हूँ।लेकिन यह भी सत्य है कि इन कथाओं का मन्तव्य समाज मे लोगों को सन्मार्ग पर ले जाना और परोपकार के लिए प्रेरित करना ही रहता है।जैसे कि- गुरु मछिंदरनाथ अपने दस हजार शिष्यों के साथ हिमालय में आज भी विचरण करते हैं। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी इसी का सहारा लिया। उनकी बात से तथाकथित प्रगतिशील लोग इत्तेफ़ाक़ रखते हों अथवा न रखते हों ,पूर्वांचल की भोली भाली, धर्मभीरु शिक्षित,और अनपढ़ गंवार जनता पूरी तरह प्रभावित होती है और हुई है। भारतीय जनता को पश्चिम का वैज्ञानिक दृष्टिकोण,मार्क्स के द्वंदात्मक भौतिकवाद और सुरेश साहनी के #समन्वयवाद से ज्यादा मतलब नहीं है। उसे लालू जी और मोदी जी की तरह उनकी दुखती रगों को सहलाने वाली और उनसे अंतरंगता का एहसास कराने वाली आत्मीय भाषा अधिक आत्मीय लगती है।
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सच से आँख चुराएं कैसे। अन्तस् से बिक जाएं कैसे।। कुछ सुविधाओं के एवज में ग़ैरत से गिर जायें कैसे।। नोटों में बिकने वालों से अपने वोट बचायें कैसे।। नारी गृह में नेता सोचे अपनी हवस मिटायें कैसे।। मंत्री जी की गिद्ध नज़र से बचे भला बालायें कैसे।। बन्धक अपने खेत पड़े हैं घर रेहन रख आएं कैसे।।। कोरे भाषण से क्या होगा बच्चों को समझाए कैसे।। सुरेश साहनी, कानपुर
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दर्द है उनकी कमर में लेकिन। पांव लटके हैं क़बर में लेकिन।। हुस्न है उनकी पकड़ से बाहर इश्क़ है उनकी नज़र में लेकिन।। रात को तौबा भी कर लेते हैं भूल जाते हैं फ़ज़र में लेकिन।। हिलता रहता है सरापा उनका शौक़ है उनके जिगर में लेकिन।। रस्सियां जल के बुझी चाहे हैं अब भी ऐंठन है बशर में लेकिन।। रात ढलनी है चिरागों सच है वक्त है अब भी सहर में लेकिन।। सुरेशसाहनी