तीरगी अपनी करके हवाले मेरे।

मुझसे हर ले गया वो उजाले मेरे।।


कब मुअज्जम ने आने दिया बाम पर

खाक़ सुनते ख़ुदाबन्द नाले मेरे।।


सब है अपने समझना बड़ी भूल थी

घर न मेरा न मस्जिद शिवाले मेरे।।


मंजिलों मरहलों में बदलती रहीं

बस निशानी हैं पावों के छाले मेरे।। 


बढ़ चुका हूँ मैं आगे तेरी सोच से

अब तो रस्ते के पत्थर हटा ले मेरे।।


साहनी सुरेश, कानपुर

9451545132

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