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छोटुवा

एगो मित्र के दुकान कस्बा में बावे ,एकदम्म रोडवे से सटल ।मित्र के छोट भाई छोटू बैठेलन । एक हाली गौंवे के एगो काका लगिहन बाछी लिहले जात रहुवन । छोटूवा बोललस ,काका सकराहे केने हो ? काका कहुवन ,पाल खईले बिया भारी करे ले जात बानी । बात आईल गईल हो गईल । एक दिन काका काकी के साथै जात रहुवन । छोटुवा पूछता ,ए काका आजू नाही बताईब केने जात हईं ?काका लाठी तान के खदेर लिहलन ।

दिल्ली चलो

कुछ बनना है तो दिल्ली चलो ,'मेरे मित्र कवि श्री अमरीक सिंह दीप ने यह कविता बीसेक साल पहले लिखी थी । मैं अक्सर देखता हूँ की सारी गोष्ठियां ,सम्मेलन ,कांफ्रेंस सब दिल्ली में होते हैं । इस हिसाब से लगता है ,  सारे बुद्धिजीवी दिल्ली  में ही रहते हैं । बाकि माने चूँ चूँ का मुरब्बा । शायद आ शुतोष कुमार और अमरेन्द्र जैसे जे एन यू वाले मित्र मुझसे सहमत होंगे । 

श्रम आन्दोलन और मीडिया की भूमिका

मीडिया की सोच स्वतंत्र नहीं होती ,मालिक की बंधुवा होती है ।पूरे देश में ढाई करोड़ सरकारी और लगभग इतने ही असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी हड़ताल पर हैं ,लेकिन मीडिया केवल दो घटनाओं को हाईलाइट कर रहा है ।एक शिंदे का भगवा आतंकवाद के आगे समर्पण ,दूसरा नॉएडा की तोड़फोड़ ।लेकिन देश के जागरूक मतदाताओं का पंद्रह प्रतिशत मौजूदा सरकार की नीतियों के विरोध में है ।यदि उनके परिवार भी जोड़े जाये तो लगभग पच्चीस करोड़ ज नता सीधे सीधे सरकार के विरोध में खड़ी है ।लेकिन अख़बार लिखते हैं :अरबों का नुकसान ,पब्लिक परेशान ।यानि देश के करोड़ों मजदूर और उनके परिजन पब्लिक नहीं है ।पूरे देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे हैं ,यह मीडिया को नज़र नहीं आता लेकिन एक नोएडा की घटना को लेकर शान से मजदूरों को गुण्डा -बदमाश लिखा जा रहा है । जो मजदूर अपने कारखाने को मंदिर समझता है वह आग क्यों लगाएगा जबकि वही उसकी रोज़ी रोटी है।फिर फैक्टरीयों को खाली करके आग लगाना और फर्जी बीमा रकम हासिल करना किसका काम है ,यह एक अनाड़ी भी बता सकता है । इस बार के आन्दोलन को राजनैतिक कहना अज्ञानता ही कहलायेगा।लेकिन किसको सफाई दें ?गडकरी को ,शरद ...
मीडिया की सोच स्वतंत्र नहीं होती ,मालिक की बंधुवा होती है ।पूरे देश में ढाई करोड़ सरकारी और लगभग इतने ही असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी हड़ताल पर हैं ,लेकिन मीडिया केवल दो घटनाओं को हाईलाइट कर रहा है ।एक शिंदे का भगवा आतंकवाद के आगे समर्पण ,दूसरा नॉएडा की तोड़फोड़ ।लेकिन देश के जागरूक मतदाताओं का पंद्रह प्रतिशत मौजूदा सरकार की नीतियों के विरोध में है ।यदि उनके परिवार भी जोड़े जाये तो लगभग पच्चीस करोड़ ज नता सीधे सीधे सरकार के विरोध में खड़ी है ।लेकिन अख़बार लिखते हैं :अरबों का नुकसान ,पब्लिक परेशान ।यानि देश के करोड़ों मजदूर और उनके परिजन पब्लिक नहीं है ।पूरे देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे हैं ,यह मीडिया को नज़र नहीं आता लेकिन एक नोएडा की घटना को लेकर शान से मजदूरों को गुण्डा -बदमाश लिखा जा रहा है । जो मजदूर अपने कारखाने को मंदिर समझता है वह आग क्यों लगाएगा जबकि वही उसकी रोज़ी रोटी है।फिर फैक्टरीयों को खाली करके आग लगाना और फर्जी बीमा रकम हासिल करना किसका काम है ,यह एक अनाड़ी भी बता सकता है । इस बार के आन्दोलन को राजनैतिक कहना अज्ञानता ही कहलायेगा।लेकिन किसको सफाई दें ?गडकरी को ,शरद ...

रेप और बलात्कार

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रेप? ये तो दिल्ली में होता हैं  गाँव-गलियारों में  हँसी -मजाक होती है ,छेड़छाड़ नहीं । अरहर और गन्ने के खेतों में  बलात्कार नहीं होते, परंपरा- निभाई होती है । वैसे भी बड़े आदमी से  बुरा नहीं माना जाता । लीला को पाप तो ना बोल , फिर अपनी गैय्या सम्हाल के क्यों नहीं रखते ? गंवार कही के !!! अरे छेड़छाड़ तो दिल्ली में होती है, वह भी मेट्रो में या बस में । और सुन ! बेटी से रोटी भिजवा देना थाने में दरोगा जी कब के भूखे हैं , बेचारे!!

भोजपुरी लोकगीत --गायक-मुहम्मद खलील

अमवा के बारी में बोले रे कोयिलिया ,आ बनवा में नाचेला मोर| पापी पपिहरा रे पियवा पुकारे,पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे, छलकल गगरिया मोर     निरमोहिया रे, छलकल गगरिया मोर||........... छलकल .... सुगवा के ठोरवा के सुगनी निहारे,सुगवा सुगिनिया के ठोर, बिरही चकोरवा चंदनिया निहारे, चनवा  गईले कवने ओर निरमोहिया रे, . छलकल .... नाचेला जे मोरवा ता मोरनी निहारे जोड़ीके सनेहिया के डोर, गरजे बदरवा ता लरजेला मनवा भीजी जाला अंखिया के कोर    निरमोहिया रे, . छलकल .... घरवा में खोजलीं,दलनवा में खोजलीं ,खोजलीं सिवनवा के ओर , खेत-खरिहनवा रे कुल्ही खोज भयिलीं,     पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे,     छलकल ....

भारत में वैश्विक आर्थिक मंदी बेअसर क्यों.

अभी हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एक रिपोर्ट में कहा की वैश्विक मंदी का असर भारत पर इसीलिए नहीं हुआ,क्योंकि भारत की बैंकिंग व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इन्टरनेट से नहीं जुड़ा था|कम से कम अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने मनमोहन को अप्रत्यक्ष रूप से सराहा|यद्यपि मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ|भारत की अर्थव्यवस्था वस्तुतः जटिल अर्थ व्यवस्था है|या यूँ कहे भारत एक मात्र ऐसा देश है ,जहाँ विनिमय और व्यापार क े सभी स्वरुप प्रचलित हैं|यह ऐसा देश है जहाँ सरकारी,अर्ध सरकारी ,सहकारी,सार्वजनिक और निजी सभी प्रकार की व्यवस्थाएं एक साथ चल रही हैं|सभी सरकारी संस्थाओं में आउटसोर्सिंग के जरिये निजी क्षेत्र सक्रिय है|और सभी निजी क्षेत्र सरकारी ऋणों और अनुदान पर चल रहे हैं|सब्सिडी निजी क्षेत्र को उपकृत करने का ही एक माध्यम है|सभी चलते संस्थान घाटे में लाकर निजी हाथों में बेचे जाते हैं, और सभी निजी संस्थाओं के घाटे में जाने पर सरकार टेक ओवर करती है,ऋण माफ़ करती है,बेल आउट जारी करती है| इस प्रकार यहाँ राष्ट्रीयकरण और निजीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है| लेकिन मेरा मूल उद्देश्य उन बिन्दुओं को खोजना था की भ...