याचना स्वीकार मेरी प्राण तुमसे हो न पायी
तुम कहाँ वन वन भटकती सो महल में जा समाई।।
जानकी तुम क्या ही होती
राम मैं भी हो न पाया
और योगी सम लखन
निष्काम मैं भी हो न पाया
रक्षवृत्तीय हो चुकी हैं अर्थयुग में कामनाएं
अब श्रवण किसके भला सुनते हैं निर्धन की दुहाई।।....
देखना दृग कन्त के अरु
कन्त पद अनुसरण करना
सात जन्मों तक निभाना
साथ जिसका वरण करना
मैं यही आदर्श लेकर आज एकाकी खड़ा हूँ
तुम समय के साथ हो इसमें भला कैसी बुराई।। .....
Comments
Post a Comment