ग़ज़ल मेरी कहाँ थी वो तुम्हारी तर्जुमानी थी।

कहो क्यों तर्क की तुमने तुम्हारी तो कहानी थी।।

मुझे महफ़िल से क्या लेना किसी को क्यों बताए हम

तुम्हीं से अपनी रौनक थी तुम्ही तो जिंदगानी थी।।


कभी खट्टी कभी मीठी कई बातें ज़रूरत बिन

तुम्हारे साथ गुज़रे पल तुम्हारे साथ बीते दिन

वो पगडंडी वो मेड़ों पर गुज़ारी लंतरानी थी।।


झगड़ना शाम बंधे पर सुबह हँस कर बुला लेना

चलो स्कूल चलना है ये कहकर साथ चल देना

न शर्माना न इतराना न मन में गांठ आनी थी।।


अभी मैं आप हूँ शायद अभी तुम भी कहाँ तुम हो

कहाँ ढूंढू स्वयं को मैं अभी तुम भी कहीं गुम हो

समय था पास क्यों लाया अगर दूरी बनानी थी।।साहनी

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