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Showing posts from December, 2025
 बहर की बाँह मोड़े जा रहे हैं सुख़न की टाँग तोड़े जा रहे हैं हमें मालूम है उनकी हक़ीक़त मगर वो हैं कि छोड़े जा रहे हैं।।साहनी
 किसने बोला हम गुलाम थे क्राउन किंग हमारा भी था हिंदुस्तान तुम्हारा था तब  ग्रेट ब्रिटेन हमारा भी था।।....... भूल गये जब आधे नङ्गे गांधी से तुम हार गये थे गोलमेज के सारे प्रतिनिधि उस गांधी पर वार गये थे जिसकी नैतिकता के चलते विश्वविजेता हारा भी था....... भूल गये क्या भगत सिंह को जब लन्दन तक थर्राया था बहरे अंग्रेजी शासन को सुनना जिसने सिखलाया था एक सिंह ने जाकर तुमको लन्दन में ललकारा भी था....... अब भी हम शासन करते हैं यहाँ वहाँ सब दुनिया भर में अप्प दीप बनकर उजियारा भरते हैं धरती अम्बर में कैसे माने सूरज तारों - के, घर में अंधियारा भी था...... साहनी सुरेश, अदीब, कानपुर 9451545132
 ग़ज़ल के शिल्प में  बेशक कमी है। ग़ज़ल लेकिन बहुत अच्छी हुई है ।। इधर है संस्कृत अरबी उधर है ग़ज़ल गोया तसद्दुद में फँसी है।। लगे हैं सब नया इक नाम दें दें ग़ज़ल है गीतिका है तेवरी है।।  पराई किस नज़र से मान लें हम ग़ज़ल माँ भारती की ही जनी है।। कहेंगे सब भले माने  न माने सुना है इक गज़लगो साहनी है।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 जीना है दिन चार समझ में आया कुछ। फ़ानी है संसार समझ में आया कुछ।। सुख के साथी सब हैं दुख में कितने हैं इस जग का व्यवहार समझ में आया कुछ।। कहीं नहीं है फिर भी सबमें शामिल है मायापति दातार समझ में आया कुछ।। चंदा सूरज और सितारों से आगे उस का पारावार समझ में आया कुछ।। खाली हाथों भेजा खाली बुला लिया उसका कारोबार समझ में आया कुछ।। सारी दुनिया जिसका खेल तमाशा है जादूगर है यार समझ में आया कुछ।।
 इश्क़ में आख़िर क्या बँटवारा होना है जब उसका सारे का सारा होना है क्या बालू क्या पत्थर क्या माटी देखें सागर से मिलकर सब खारा होना है इश्क़ समुन्दर अपनी ज़िद पर क़ायम है हुस्न तुझे ही पारा पारा होना है तय करनी है दूरी हिम से सागर की  दर दर फिरना है बंजारा होना है अपनी हस्ती होनी है उसकी हस्ती प्यार कहाँ किस से दोबारा होना है पाना है या चढ़ जाना है सूली पर आज यहीं सब वारा न्यारा होना है आज साहनी दिल से दिल का सौदा कर इससे कम क्या खाक़ गुजारा होना है सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 नित्य दक्षिण वाम होना ठीक है क्या। श्वेत मन का श्याम होना ठीक है क्या।। प्रेम है अनमोल सम्पति से न तोलो भावना का दाम  होना ठीक है क्या।। दृष्टि शूलों की मलिन संक्रान्तियों में रूप का अभिराम होना ठीक है क्या।। मैं न त्यागूंगा तुम्हें रखकर अधर में यूँ भी मेरा राम होना ठीक है क्या।। कौन पहचानेगा उनको साहनी अब खास का यूँ आम होना ठीक है क्या।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 चलो हम मान लेते हैं कि हम हैं। भले दो चार कहते हैं कि हम हैं।। तुम्हारा क्या पता तुमको पता है कई ख़ुद को समझते हैं कि हम हैं।। कि हम क्या हैं हमें मालूम है क्या मगर हम कहते फिरते हैं कि हम हैं।।
 तुम जो दिल के करीब हो जाते। सच में हम खुशनसीब हो जाते।। साथ देते जो तुम तो फ़िक़्र न थी लाख दुश्मन रकीब हो जाते।।साहनी
 यहां जो जलवानुमा रोशनी सी बिखरी है कि चारसू जो खुशी ही खुशी सी बिखरी है यहां जमात जो आयी है धूप सी छनकर शशी के नाम वही चांदनी सी  बिखरी है
 हम अंधेरों का दबदबा देखें या चिरागों का हौसला देखें।। हमने देखें हैं वालिदैन अपने क्या ज़रूरी है हम ख़ुदा देखें।।साहनी मुक्तक
 तुम अगर निकले ग़ैर क्या निकले। हम तो ख़ुद हम से दूर जा निकले।। जिस्मे-फ़ानी से क्या गिला करना रूह जब अपनी बेवफा निकले।।साहनी
 ख़ुद को यूँ भगवान समझना ठीक नहीं औरों को बेजान समझना ठीक नहीं।। औरों को गुणहीन बताते फिरते हो यूँ ख़ुद को गुणवान समझना ठीक नहीं।।साहनी मुक्तक
 किसने बोला कि ख़ुद को ज़ाया कर। कुछ मगर नेकियां कमाया कर।। कुछ तो अहदे वफ़ा निभाया कर। याद आ आ के मत सताया कर।। बेवज़ह ख़ुद को मत रुलाया कर। गीत खुशियों के गुनगुनाया कर।। तेरे अपने ही तुझको भाव न दें ख़ुद को इतना भी मत पराया कर।। जो तुझे देख कर के हँसते हैं अपने ग़म उनपे मत नुमाया कर।। दुश्मनों को ही मत समझ दुश्मन दोस्तों को भी आज़माया कर।। साहनी ग़म से है रईस मग़र ख़ुद से दुनिया को मत बताया कर।।
 इस दिले-बीमार से बाहर निकल। स्वप्न के संसार से बाहर निकल।। वो कहानी है अधूरी हर तरह मर चुके  किरदार से बाहर निकल।। जिसकी खबरों पर नहीं तुझको यक़ीन अब तो उस अखबार से बाहर निकल।। आस है साहिल की जर्जर किश्तियाँ डूब कर मझधार से बाहर निकल।। जो तुम्हारे धर्म के प्रतिकूल है ऐसे हर व्यवहार से बाहर निकल ।।
 कहने को भले लोग भी दो-चार मिलेंगे। वरना सभी मतलब के लिए यार मिलेंगे।। तुम पारसा हो उन्हें
 हो लुधियाना कि दिल्ली सब बराबर धुँआ नथुनों में गोया बस गया है।।
 गर्दिशों में जूझ जा गिरदाब से बाहर निकल। शम्स है तू तीरगी के ताब से बाहर निकल।।
 ये नहीं है कि प्यार है ही नहीं। दरअसल वो बहार है ही नहीं।। वो तजस्सुस कहाँ से ले आयें जब कोई इंतज़ार है ही नहीं।। फिर मदावे की क्या ज़रूरत है इश्क़ कोई बुख़ार है ही नहीं।। क्यों वफ़ा का यक़ी दिलायें हम जब उसे एतबार है ही नहीं।। मर भी जायें तो कौन पूछेगा अपने सर कुछ उधार है ही नहीं।। आपकी फ़िक्र बेमआनी है साहनी सोगवार है ही नहीं।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132