वर्जनाएं 

उम्र भर ढोते रहे

सहजताएँ

प्राकृतिक खोते रहे

किसलिये फिर 

मुक्ति पाने के लिए

पत्थरों के

सामने रोते रहे.....

सुरेश साहनी ,कानपुर

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