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 बेवज़ह की रार में मारा गया। मैं यहाँ बेकार  में मारा गया।।  कोई सुनता है ये कैसे मान लें सर अगर दीवार में मारा गया।। बस अहिल्या ही सदा शापित हुई इंद्र कब व्यभिचार में मारा गया।। देह का क्या बेवज़ह रूठी रही और मन मनुहार में मारा गया।। काश नफ़रत सीख जाता साहनी इब्तिदा-ए- प्यार मे मारा गया।। सुरेश साहनी, कानपुर
 सब न बेचो दुकानियों के लिये। कुछ तो रख लो निशानियों के लिये।। इतने ज़्यादा भी बाँध मत बाँधो क्या बचेगा  रवानियों  के लिये।। यूँ भी दुनिया बदलने वाली है तुम न होगे कहानियों के लिये।। रास्ते राजपथ के छोड़ो भी इन उमड़ती जवानियों  के लिये।। एक दिन लोग तुम पे थूकेंगे आज की लन्तरानियों  के लिये।। सुरेश साहनी
 लाख मुझको नदी समझता था पर मिरी तिश्नगी समझता था।। दिल उसे देवता न कह पाया वो मुझे आदमी समझता था।। दिल पे जो ज़ख़्म दे गया इतने इक वही दर्द भी समझता था।। दरअसल नूर था उसी दर पर मैं जहाँ तीरगी समझता था।। आशना है अज़ल से वो मेरा और मैं अजनबी समझता था।। उफ़ वो गुफ्तारियाँ निगाहों की मैं उसे ख़ामुशी समझता था।। हाँ बहुत बाद में कहा उसने इक उसे साहनी समझता था।। सुरेश साहनी अदीब 9451545132
 लोग बेशक़ जहीन थे उनमें। बस वहाँ आदमी न थे उनमें।। जाने कितने महीन थे उनमें। हम ही तशरीह-ए-दीन थे उनमें।। तीरगी सी लगी न जाने क्यों सब सितारा-जबीन थे  उनमें।। जो भी मिलता था बस तकल्लुफ़ से लोग थे या मशीन थे उनमें।। सब वहाँ शोअरा थे अच्छा है पर कहाँ हाज़रीन थे उनमें।। महफ़िले-कहकशां कहें क्यों कर दिल के कितने हसीन थे उनमें।। सब थे तुर्रम सभी सिकन्दर थे साहनी ही रहीन थे उनमें।। ज़हीन/समझदार महीन/शातिर,कूट चरित्र तशरीह-ए-दीन/ स्पष्ट,ईमान वाले तीरगी/अंधेरा सितारा-जबीन/रोशन मस्तक तकल्लुफ़/औपचारिकता शोअरा/कविगण हाज़रीन/दर्शक वृन्द कहकशां/निहारिका, आकाशगंगा तुर्रम/बड़बोले सिकन्दर/महत्वाकांक्षी रहीन/बंधुआ, साधारण सुरेश साहनी , कानपुर 9451545132
 जाने कितने ज़ख़्म दिल पर दे गया। जो  मुझे  ग़म के  समुंदर  दे  गया।। ले गया  नींदे   उड़ाकर  बेवफा पर मुझे ख़्वाबों के लश्कर दे  गया।। गुलबदन कहता था मुझको प्यार से हाँ वही कांटों का बिस्तर दे  गया।। ले गया  सुख चैन जितना ले सका उलझनें लेकिन बराबर दे  गया।। सादगी क़ातिल की मेरे देखिये मुझको उनवाने- सितमगर दे गया।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 अक्सर ये उजाले हमें गुमराह करे हैं। ख़ुदग़र्ज़ हवाले हमें गुमराह करे हैं।। भाई न बिरादर न हैं ये काफ़िले वाले ये ख्वामख्वाह साले हमें गुमराह करे हैं।। क़ातिल पे भरोसा हुआ जाता है सरीहन जब चाहने वाले हमें गुमराह करे हैं।। मत ढूंढिये मत खोजिये यूँ चटपटी खबरें ये मिर्च-मसाले हमें गुमराह करे हैं।। शफ्फाक लिबासों से ज़रा दूर रहा कर दिल के यही काले हमें गुमराह करे हैं।। गुमराह/भ्रमित,  ख़ुदग़र्ज़/स्वार्थी  हवाले/सम्बन्ध, दृष्टान्त ख़्वाहमखाह/जबरदस्ती, इच्छा के बग़ैर सरीहन/जानबूझकर शफ्फाकलिबास/ सफेदपोश, उजले वस्त्र धारी सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 ज़िन्दगी जब मकान छोड़ेगी। क्या कोई भी निशान छोड़ेगी।। फिर कोई भी ना रह सके उसमें करके ये इत्मिनान छोड़ेगी।। सुख सुकूँ सब तो छीन लेती है क्यों वो रत्ती सी जान छोड़ेगी।। क्या अना इस क़दर ज़रूरी है ज़िन्दगी कब गुमान छोड़ेगी।। ला मकां का नहीं पता कोई पर तुझे लामकान छोड़ेगी।। सुरेश साहनी, कानपुर