ग़ज़ल

आईये बेअदब हुआ जाए।
गो कि मीरे-अरब हुआ जाए।।
जो कि अज़दाद ना हुए अबतक
आज कुछ वो ही सब हुआ जाए।।
कौन सी उम्र है मुहब्बत की
मुब्तिला इस में कब हुआ जाए।।
उलझनों से निज़ात पाने को
वेवज़ह बेसबब हुआ जाए।।
रब के उपर हैं आफ़तें इतनी
कौन सोचेगा रब हुआ जाए।।
अब अदम में कोई सुकून कहाँ
शरीक़-ए-वज़्म-ए-तरब हुआ जाए।।

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