अभी भी लोग कविता और गजल सुनने को आते हैं।
अब भी लोग अच्छी पंक्ति पर ताली बजाते हैं।।
कमी है अपने अंदर दोष हम औरों को देते हैं
सुनाते चुटकुले हैं और खुद को कवि बताते हैं।।

मसअला यूँ तो कोई खास था।
हाँ कभी इस कदर उदास था।।
उसका होना होना ही होता
वो तो पहले भी मेरे पास था।।
यूँ आया मेरे जनाजे में
पास उसके नया लिबास था।।
मेरे मरने पे खैर क्या रोता
उसका चेहरा भी गमशनास था।।
उसने पुछा तो था मगर ऐसे
ज़ाम तो था फ़क़त गिलास था।।
बीच धारा मे मुझको छोड़ गया
यूँ भी होगा मुझे कयास था।।
उसने शायर बना दिया मुझको
मैं अदीबॉ के आस पास था।।
उसने तब खुद को बेहिजाब किया
जब मुझे होश--हवास था।।








तुम्हें आराम में जीने की लत है।
मुझे आराम से जीने की लत है।।
मेरी कीमत रूपये में आंकते हो
तुम्हारा आंकलन कितना गलत है।।
पराये दर्द को अपना समझना
यही सबसे बड़ी इंसानियत है।।
अगर माँ बाप जिन्दा हैं तो समझो
घटाओं में तुम्हारे सर पे छत है।।
मुझे लगता नहीं फ़ानी है दुनिया
कि ये आदम से अबतक अनवरत है।।...

तुम क्या जानो कोई कुनबा कैसे बनता है।
तुम को क्या लगता है कोई खेल तमाशा है।।
कहने को तो जीभ चलाओ कुछ भी बक डालो
भानमती के दिल से पूछो क्या क्या होता है।।
जिसको तुम बेदर्दी से स्वाहा कर देते हो
उतना घर बनने में एक ज़माना लगता है।।
ये बहरी सरकारें कब जनता की सुनती हैं
गांव गली से संसद तक चिल्लाना पड़ता है।।
संसद में जब प्रश्न उछलकर चुप हो जाते है
तब सड़कों पर आने पर ही उत्तर मिलता है।।
वो रास्ते जिनसे सटे ऊँचे मकान हैं।
वीरानियाँ लिए हैं बहुत सूनसान हैं।।
पूजा नमाज में कोई पंडित या मौलवी
किस वास्ते दोनों हमारे दरमियान हैं।।
आदम का दीन क्या था बताये कोई हमें
फ़िलहाल कोई हिन्दू कोई मुसलमान है।।
गांधी की जगह गोडसे को पूज रहें हैं
कैसे यकीं करें कि ये हिन्दोस्तान है।।
नफरत यहाँ का सबसे बड़ा कारोबार है
मजहब यहाँ की सबसे पुरानी दुकान है।।
कतरा कभी रहा नहीं कहते हैं सब "अदीब'
गोया सभी समन्दरों के वारिसान है।।
मित्र मेरे अनवरत बढ़ते रहे।
इसलिए हम दीप बन जलते रहे।।
इक मरुस्थल विश्व जैसे नेह बिन
आत्मा निर्मूल्य जैसे देह बिन
नेह की खातिर भटकते ही रहे।।
अंत खाली हाथ रहना था हमें
था भ्रमित कुछ भी मिलना था हमें
जानकर अनजान हम बनते रहे।।
प्रेम में मिलना बिछड़ना गौण है
ये सभी तो प्रेम पथ के मोड़ हैं
हम बिना विचलित हुए चलते रहे।।
खूब भाता है मुझे मेरा शहर।
कुछ तो देता है मुझे मेरा शहर।।
नींद के बदले थकन के संग में
ख्वाब देता है मुझे मेरा शहर।।
खो गया बचपन जवानी भी गयी
यूँ सताता है मुझे मेरा शहर।।
उजाड़ता है वक्त मुझको जब कभी
फिर बसाता है मुझे मेरा शहर।।
टूटकर फिर संवरता हूँ इस तरह
आजमाता है मुझे मेरा शहर।।
घूमकर दुनिया मैं आता हूँ यहीं
कितना भाता है मुझे मेरा शहर।।...
जिंदगी हम को जगाती है थका देती है।
मौत थक जाने पे बाँहों में सुला लेती है।।
सिलसिला सोने का जगने का चलाता है कोई
ये कुदूरत हमें कब उसका पता देती है।।
मुहब्बत है ये मत कहिये सनक है।
जो है दीवानगी की हद तलक है।।
ये ले जाती है खुद जाती नहीं है
मुहब्बतगंज की ये ही सड़क है।।
तेरी अंगड़ाईयों का तर्जुमा है
मेरी तहरीर में जो भी लचक है।।
सियासत बन गयी तकदीर मेरी
सुबह से शाम तक उट्ठा पटक है।।
गया है लड़खड़ाते जो भी आया
तेरे स्कूल का कैसा सबक है।।
किसे सूली का डर दिखला रहे हो
हमी मनसूर हैं जो अनलहक है।।
वो मेरा है मुझे उसपे यकीं है
मुहब्बत हैं कहाँ गर कोई शक है।।
नारद गीता अथवा श्रीनारदादि भक्तिसूत्र में नारद जी ने बताया है-
यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः सः धर्मः।।(अर्थात जिससे इस लोक में उन्नति और परलोक सुरक्षित हो वही धर्म है।) नीचे इस भाव का काव्यानुवाद किया है।
यक्ष प्रश्न बन खड़ा सामने।
बढ़ते डग जो लगा थामने।
नैतिकता पर हावी भौतिक-
जरूरतों को किया काम ने।।
ये चारो पुरुषार्थ कहाते।
वर्णन करते नहीं अघाते।
चारो वेद पुराण अष्टदश
छहो उपनिषद ये ही गाते।।
किन्तु धर्म की यह परिभाषा।
जो नारद गीता की भाषा।
यह मेरे मन को भाती है
दे देती है सहज दिलासा।।
जिससे हो इस लोक में उन्नति।
ब्रम्हलीनता जिसकी परिणति।
सत्य कहें तो यही धर्म है
जीते उन्नति मरते सदगति।।
वो रंज वो अलम वो जमाने नहीं रहे।
अब हम सम्हल गए हैं दीवाने नहीं रहे।।
तूफ़ान में भी दे सकें इक दूसरे का साथ
उस दौर के वो समापरवाने नहीं रहे।।
अब किस के वास्ते जियें हम किसपे मर मिटें
जब वो हकीकतें वो फ़साने नहीं रहे।।
खुलते थे जो जकात खैरात के लिए
वो दिल नहीं रहे वो खजाने नहीं रहे।।
अल्लाह जाने क्या है हमारे नसीब में
उनके शहर में अपने ठिकाने नहीं रहे।।
अब किसको अज़ल और कयामत पे है यकीन
अब इन्तेज़ार वाले जमाने नहीं रहे।।
साकी रहा जाम अब मैकदा रहा
वाइज के कारोबार के माने नहीं रहे।।
हम ख़ुदकुशी की राह पे यूँ चल पड़े अदीब
जीने के अपने और बहाने नहीं रहे।।

हमारा साथ भले उम्र भर रहे रहे।
मेरी दुआओं में इतना असर रहे रहे।
मैं हर कदम पे तुम्हे रास्ता बताऊंगा
ये और बात कि तुम को खबर रहे रहे।।
तुम्हे भी हुस्न पे इतना गुरुर ठीक नहीं
ये जिस्म क्या है किराये का घर रहे रहे।।
खुद तो फानी है मगर फ़िक्र हैं तो किसकी है
ये घर मकान ये जमीनों-जर रहे रहे।।
परिंदे रोज ठिकाना नया बदलते हैं
वो जानते हैं कि कल ये शजर रहे रहे।।
इन निगाहों में रख मुकाम रास्ते को नहीं
बदलते वक्त में ये रहगुजर रहे रहे।।
गए जमाने के सिक्कों को कौन लेता है
भिखारियों का भी आना इधर रहे रहे।।
मेरी मजार बनाओ मेरे रकीबों में
हमारा चाहने वाला उधर रहे रहे।।
अब तो इश्क पे बंदिश हुस्न का पर्दा
खुदा रहम करे उसका भी डर रहे रहे।।

खटखटाया द्वार हर एक बार मैंने।
पर पाया प्रेम का आगार मैंने।।
विश्व सारा कोई अपरम्पार मेला
भीड़ इतनी और मैं कितना अकेला
क्यों अकेलापन किया स्वीकार मैंने।।
हाँ प्रतीक्षा की घडी कितनी बड़ी थी
रात जैसे प्राण लेने पर अड़ी थी
कष्ट झेले पर मानी हार मैंने।।
मत कहो संदेह में जीता रहा हूँ
बस तुम्हारे नेह में जीता रहा हूँ
तुझमे देखा है मेरा संसार मैंने।।

मुझे भी अब नहीं पहचानता है।
यकीनन वो बड़ा तो हो गया है।।
अगर कुछ दे सको तो साथ आओ
यही अब दोस्ती का फलसफा है।।
कभी दिल में मेरे रहता था लेकिन
इधर वो कुछ दिनों से लापता है।।
हमारा घर बहुत छोटा है तो क्या
हमारा दिल बहुत ज्यादा बड़ा है।।
वही कहते हैं जो दिल सोचता है
वही करते हैं जो दिल चाहता है।।

हर ओर होते चीर हरण
कुमारियों के आर्तनाद -
को अनसुना करते कान
अनदेखी करती आँखें
दरबारी या तो मौन
या तो सहमत
और आप भी
कभी निगाहें फेरकर
कभी मौन रहकर
जब खुद को विवश
या असहाय
कह कर बचते हैं
तब आप अपनी शरशैया
खुद तैयार करते हैं।
हाँ !यह सत्य है
पितामह भीष्म
हर युग में होते हैं।।

अंतरात्मा का सौदा हमको करना है।
अब हमको भी छद्मवेश धारण करना है।।
घड़ियाली आंसू से अपने क्लेश धुलेंगे
समाजवाद की यह भभूत तन पर मल लेंगे
अब मौसम की तरह हमें बदला करना है।।
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन अपनाएंगे
हर हर बम बम के स्वर में हम भी गाएंगे
धनपशुओं के लिए हमें जीना मरना है।।
कॉमरेड जैसी जीवन शैली अपनाकर
मजदूरों के लिए क्रांति का बिगुल बजाकर
दो रोटी के एवज में सौदा करना है।।
जोर जोर से जय

बा जय भीम कहेंगे
जातिवाद के खम्भे को जमकर पकड़ेंगे
बाबा के सपनों से क्या लेना देना है।।
गांधी नेहरू खादी चरखा बेमतलब है
राहुल और सोनिया से हमको मतलब है
अब लिनेन धारण कर दस जनपथ चलना है।।
मैं मुसलसल सफर में रहा।
ताउमर रहगुजर में रहा।।
प्यार में जिसने धोखा दिया
मैं उसी के असर में रहा।।
वो नजर से गिराता रहा
जो हमारी नजर में रहा।।
जो मजा मेरी वहशत में है
वो मजा कब पिशर में रहा।।
अपनी उम्मत सुकुं से रहे
इसलिए मैं हिजर में रहा।।
खुद से कितना मैं था बेखबर
उम्रभर मैं खबर में रहा।।
हैफ उसने नजर फेर ली
जो हमारे जिगर में रहा।।
आज वो मोहतरिम हो गया
जो इधर का उधर में रहा।।
वो ही बेघर मुझे कर गया
जो हमारे ही घर में रहा।।
हुश्न को बुतकदा चाहिए
इश्क़ तो खंडहर में रहा।।

मुझमें सदा जगी रहती है उस कवि की अभिलाषा।
जिसे पसंद नहीं आती है राजनीति की भाषा।
मैं कर दूंगा सर्वस्व निछावर कवि की सारंगी पर
कम भाता है राजनीति का चारण ढोल तमाशा।।
मैं यथार्थ से अनजान था।
मुझे दोस्तों पे गुमान था।।
क्या गिला जो सबने भुला दिया
तुर्बत का मैं सामान था।।
जिसे घर कहा वो सराय थी
मैं मकीं था मेहमान था।।
मैं चला तो क्या मेरे हाथ था
जमीन थी मकान था।।
मैंने जर जमीन जमा करी
मुझे अपने कल का पता था।।
मुझे एक पल सिवा मिला
जहाँ सौ बरस इमकान था।।
मैं खुदा से इश्क़ कर सका
गो कि काम ये आसान था।।

तेज बहती हों हवाएँ चल रही हों आँधियाँ।
जब भी गहराये अँधेरा हम जलाते हैं दिया।।
जब कभी खुशियों का सूरज भी निकलना छोड़ देगा।
चंद्रमा भी राहु के भय से चमकना छोड़ देगा
बन के जुगनू हम करेंगे जंग की तैयारियां।।
मैं तुम पर कविता लिख दूं तो
कविता सुन्दर बन सकती है।
मैं तुमपर यदि गीत सुनाऊँ
नई रागिनी बन सकती है।।
सुंदरता को सुंदर होना
है तो तुमसे प्रीत गाँठ ले
और घटा को गहराना हो
तो तेरे केशों की ओट ले
तुम क्या जानो हंसी तुम्हारी
कहीं दामिनी बन सकती है।
प्राणदायिनी दृष्टि तुम्हारी
प्राण हरण भी कर सकती है।।

मैं सड़कों पर धूल फांकने निकला हूँ।
सत्य कहूँ ! नौकरी ढूँढने निकला हूँ।।
कब हमको खाली रहना अच्छा लगता है
किन्तु नौकरी का मिलना सपना लगता है
भैया ने नफरत से देखा झेल गया पर
तीर सरीखा भाभी का ताना लगता है
यही देख तकदीर साधने निकला हूँ।।
अपने पिता की नजरों में आवारा हूँ मैं
इस दुनिया की नजरों में नाकारा हूँ मैं
बेगारी में सब ने नजर फेर ली मुझसे
फिर भी अपनी माँ का राज दुलारा हूँमैं
खुशियों का संसार मांगने निकला हूँ।।
कहीं नौकरी नहीं धरी यह जान रहे हैं
किन्तु पिता जी इसी वजह से डांट रहे हैं
कौन युवा बेरोजगार की पीड़ा समझे
बाहर[a1]  दुनिया घर घर वाले काट रहे हैं
मैं अंतिम उपचार खोजने निकला हूँ।।










 [a1]

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